युगे अठ्ठावीस विटेवरी उभा — श्री विट्ठल आरती
पंढरपुर के विट्ठल की संध्या आरती, जो परंपरा से संत नामदेव की मानी जाती है; ईंट पर खड़े विट्ठल और वामांग में रखुमाई का गुणगान।
श्लोक
अट्ठाईस युगों से प्रभु ईंट पर समचरण खड़े हैं; उनके बाईं ओर देवी रुक्मिणी दिव्य शोभा बिखेर रही हैं! भक्त पुंडलिक से मिलने साक्षात् परब्रह्म पधारे हैं; और उनके श्रीचरणों में बहने वाली भीमा नदी सारे संसार का उद्धार कर रही है।
श्लोक 1
जय देव, जय देव, जय पांडुरंग! हे रुक्मिणी और राधा के प्राणप्रिय स्वामी! हे मेरे अंतरंग प्रियतम, मेरी रक्षा के लिए शीघ्र पधारिए!
श्लोक 2
गले में तुलसी की माला है, दोनों हाथ कमर पर रखे हैं; कमर में पीतांबर और माथे पर कस्तूरी का तिलक सुशोभित है! देवता और ऋषि-मुनि नित्य दर्शन के लिए आते हैं, और सामने गरुड़ तथा हनुमान श्रद्धा से हाथ जोड़े खड़े हैं।
श्लोक 3
इस पावन क्षेत्र के रक्षक प्रभु की वंशी की धुन धन्य है; उनके गले में सोने के कमल और वनमाला सुशोभित हैं! राधा, रुक्मिणी और सत्यभामा—समस्त पटरानियां परम भाव से सांवले सलोने विट्ठल की आरती उतारती हैं।
श्लोक 4
भक्तजन आरतियां उतारते हैं, मंगल दीप न्योछावर करके चंद्रभागा नदी के पवित्र जल में प्रवाहित कर देते हैं! धूप, दीप और नैवेद्य के पावन दर्शन से साधक तृप्त होते हैं; और नामदेव के स्वामी श्रीविट्ठल का प्रत्यक्ष आँखों से साक्षात् दर्शन हो जाता है!
श्लोक 5
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
महाराष्ट्र के प्रत्येक मंदिर और घर में संध्या आरती के समय, प्रायः गणेश और शिव की आरती के बाद, यह आरती गाई जाती है। इसे परंपरा से वारकरी संत नामदेव (लगभग 1270 से 1350 ई.) की रचना माना जाता है; अंतिम पद में उनका नाम छाप के रूप में आता है। 'युगे अठ्ठावीस' पौराणिक गणना की ओर संकेत करता है, जिसमें वर्तमान वैवस्वत मन्वंतर का 28वाँ चतुर्युग चल रहा है; भक्त इसे यों समझते हैं कि भगवान विट्ठल असंख्य युगों से ईंट पर अविचल खड़े भक्तों की प्रतीक्षा कर रहे हैं। नामदेव जी ने इसमें भगवान के आभूषणों, कस्तूरी तिलक और चंद्रभागा नदी के तट पर होती आरती का सजीव वर्णन किया है। ईंट पर खड़े होने की छवि पुंडलीक की कथा से आती है, जिसने माता-पिता की सेवा करते हुए कृष्ण के खड़े होने के लिए ईंट फेंकी थी; यह कथा स्कन्द पुराण (1.34 से 1.67) तथा पद्म पुराण के पाण्डुरंग-माहात्म्य में मिलती है।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Sant Namdev
क्या आप जानते हैं?
२८ युगों का रहस्य
पौराणिक गणना में वर्तमान वैवस्वत मन्वंतर (सातवाँ) का २८वाँ चतुर्युग चल रहा है; 'युगे अठ्ठावीस' विट्ठल को काल के अनादि स्वामी के रूप में दर्शाता है, जो भक्तों की प्रतीक्षा में खड़े हैं।
वामांगी रखुमाई
विट्ठल के बाईं ओर देवी रुक्मिणी (रखुमाई) दिव्य कांति के साथ विराजमान हैं। चौथे पद में राई (राधा) और सत्यभामा द्वारा भी श्याम सुंदर की आरती उतारने का वर्णन है।
पवित्र चंद्रभागा
पंढरपुर में भीमा नदी अर्धचंद्राकार रूप में मुड़कर बहती है, इसलिए इसे प्रेम से 'चंद्रभागा' कहा जाता है। पाँचवें पद में आरती के दीप चंद्रभागा में प्रवाहित करने का वर्णन है।
नामा की छाप
संस्कृत डॉक्यूमेंट्स के मराठी आरती संग्रह में इस आरती का समापन यह कहकर होता है कि नामदेव भाव से केशव को आरती ओवाळते हैं। रचयिता का अपना नाम अंतिम पंक्ति में आने से यह आरती परंपरा से वारकरी संत नामदेव की मानी जाती है। छपे और गाए जाने वाले रूपों में अंतिम पंक्ति के शब्द भिन्न मिलते हैं, और इस पृष्ठ का रूप 'नामयाचा स्वामी देखिला डोळां प्रती' पर समाप्त होता है।
Vitthal
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