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Embroidered artwork for माझें माहेर पंढरी — संत एकनाथ अभंग: Embroidered Om symbol above a brass diya, marigolds and a temple spire at sunrise

माझें माहेर पंढरी — संत एकनाथ अभंग

माझें माहेर पंढरी — संत एकनाथ अभंग

संत एकनाथ महाराज का यह अत्यंत प्रसिद्ध और करुणामय अभंग पंढरपुर को भक्त का सच्चा 'मायका' (माहेर) बताता है। एकनाथ जी कहते हैं कि भगवान विट्ठल मेरे पिता हैं और माता रुक्मिणी मेरी माँ हैं; भक्त पुंडलिक मेरे भाई हैं। इस पावन तीर्थ की स्मृति मात्र से भक्त के समस्त सांसारिक ताप मिट जाते हैं।

श्लोक

माझें माहेर पंढरी आहे भिवरेच्या तीरीं
Mājhe māhera pandharī, āhe bhivarechyā tīrī

श्लोक 1

बाप आणि आई माझी विठ्ठल रखुमाई
Bāpa āni āī, mājhī vitthala rakhumāī

श्लोक 2

पुंडलिक बंधु आहे सांची ख्याती सांगूं काय
Pundalīka bandhu āhe, sānchī khyātī sāngū kāya

श्लोक 3

माझी बहीण चंद्रभागा करीतसे पापभंगा
Mājhī bahīna Chandrabhāgā, karītase pāpabhangā

श्लोक 4

एका जनार्दनीं शरण मज माहेरची आठवण
Ekā janārdanī sharana, maja māherachī āthavana

श्लोक 5

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

शुभ दिन व तिथि

नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर

उत्तम मुहूर्त / समय

ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल

पूजन सामग्री व अर्पण

शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ
  • मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार

पृष्ठभूमि

संत एकनाथ (1533–1599) महाराष्ट्र के पैठण के महान संत थे। उन्होंने वारकरी संप्रदाय को ज्ञान, कर्म और भक्ति का सुंदर समन्वय प्रदान किया। 'माझें माहेर पंढरी' भारतीय संगीत और भक्ति साहित्य का एक अमूल्य रत्न है। पंडित भीमसेन जोशी जी द्वारा राग यमन/मिश्र खमाज में गाए जाने के बाद यह अभंग घर-घर में गूंज उठा। इसमें ईश्वर को एक राजा या न्यायाधीश नहीं, बल्कि एक स्नेहमयी माँ और पिता के रूप में देखा गया है।

क्या आप जानते हैं?

पं. भीमसेन जोशी का अमर गायन

भारत रत्न पंडित भीमसेन जोशी द्वारा गाया गया 'माझें माहेर पंढरी' अभंग-गायन का सर्वोच्च शिखर माना जाता है, जो श्रोताओं को भक्ति-भाव में सराबोर कर देता है।

'माहेर' (मायके) का भाव

महाराष्ट्र की संस्कृति में 'माहेर' वह स्थान है जहाँ बेटी को बिना किसी शर्त और बिना किसी मांग के केवल अपार दुलार और प्रेम मिलता है—ईश्वर की करुणा का यह सर्वोत्तम रूपक है।

पुंडलिक बने भाई (बंधु)

संत एकनाथ ने महान भक्त पुंडलिक को अपना 'भाई' कहकर संबोधित किया है, जिससे संपूर्ण विट्ठल-भक्त मंडली एक अखंड आत्मीय परिवार बन जाती है।

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