सुंदर ते ध्यान उभें विटेवरी — संत तुकाराम अभंग
संत तुकाराम महाराज का यह परम पावन और सर्वप्रमुख अभंग पंढरपुर के भगवान विट्ठल के दिव्य सगुण स्वरूप का अनुपम वर्णन करता है। ईंट पर समचरण खड़े, कटि पर दोनों हाथ रखे, गले में तुलसी की माला और पीतांबर धारण किए प्रभु के इस विमोहक रूप को तुकोबा अपने जीवन का सर्वोच्च आनंद बताते हैं।
श्लोक
ईंट पर दोनों पैर बराबर रखकर सीधे खड़े और कटि (कमर) पर दोनों हाथ रखे हुए वह ध्यान कितना मनोहारी और सुंदर है!
श्लोक 1
गले में तुलसी की माला और कटि पर पीतांबर धारण किया हुआ प्रभु का यही रूप मेरे चित्त को सदा-सर्वदा प्रिय लगता है।
श्लोक 2
कानों में मकराकार (मत्स्य-आकार) कुंडल जगमगा रहे हैं और कंठ में दिव्य कौस्तुभ मणि शोभायमान होकर चमक रहा है।
श्लोक 3
तुकाराम कहते हैं कि मेरा समस्त सुख इसी में समाया हुआ है; मैं परम प्रेम और अनुराग से अपने प्रभु के इस श्रीमुख को निरन्तर निहारता रहूँगा!
श्लोक 4
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
वारकरी संप्रदाय में किसी भी कीर्तन, भजन या दैनिक काकड़ आरती का शुभारंभ इसी पावन अभंग 'सुंदर ते ध्यान' से होता है। तुकाराम गाथा में इस अभंग को प्रथम स्थान (क्रमांक १) प्राप्त है। भक्त पुंडलिक द्वारा फेंकी गई ईंट पर युगों-युगों से समचरण खड़े भगवान विट्ठल वारकरी भक्तों के प्राण हैं। इस अभंग में विट्ठल के आभूषणों, पीतांबर और मकर कुंडल से सुशोभित सौंदर्य का सजीव दर्शन कराया गया है।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Sant Tukaram · मध्यकालीन वारकरी संत · 17वीं शताब्दी, महाराष्ट्र
महाराष्ट्र के देहू ग्राम के वारकरी परंपरा के एक गृहस्थ-संत, जिन्होंने विठ्ठल की स्तुति में सरल, सीधी मराठी भाषा में हजारों अभंग (भक्ति पद) रचे, जिनमें प्रायः एक अनाज-व्यापारी के रूप में उनकी अपनी कठिनाइयों, शंकाओं एवं दैनिक संघर्षों का चित्रण मिलता है।
क्या आप जानते हैं?
तुकाराम गाथा क्र. १
यह पावन अभंग प्रामाणिक तुकाराम गाथा का सर्वप्रथम पद है, जो किसी भी गूढ़ दर्शन से पहले सगुण साकार विट्ठल के प्रत्यक्ष दर्शन को स्थापित करता है।
पुंडलिक की ईंट (विटेवरी)
सिंहासनों पर विराजमान अन्य देवताओं के विपरीत, विट्ठल एक साधारण पकी हुई ईंट पर समचरण खड़े हैं, जो यह दर्शाता है कि ईश्वर भक्त के सच्चे प्रेम के वशीभूत हैं।
काकड़ आरती का अनिवार्य आरंभ
पंढरपुर के मुख्य मंदिर से लेकर महाराष्ट्र के घर-घर में प्रातःकालीन काकड़ आरती की शुरुआत इसी अभंग के सस्वर गायन से होती है।
Vitthal
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