हेचि दान देगा देवा — संत तुकाराम अभंग
संत तुकाराम महाराज का यह अत्यंत पावन और प्रसिद्ध प्रार्थना-पद है। संसार की धन-संपत्ति तो दूर, मोक्ष तक की चाह को ठुकराते हुए तुकाराम जी भगवान विट्ठल से केवल एक ही वरदान मांगते हैं—'हे प्रभु! मुझे कभी आपकी विस्मृति न हो, मैं प्रेमपूर्वक आपका गुणगान करता रहूँ और मुझे सदा संतों का संग मिले।' इस भक्ति के लिए वे बार-बार जन्म लेने को भी परम सुख मानते हैं।
श्लोक
हे प्रभु! मुझे केवल यही एक दान (वरदान) दीजिए, कि मुझे आपका विस्मरण कभी न हो (मैं आपको कभी न भूलूँ)!
श्लोक 1
मैं परम प्रेम और अनुराग से आपके गुणों का गान करता रहूँ; यही मेरा सर्वस्व और यही मेरी वास्तविक जीवन-पूंजी है!
श्लोक 2
मुझे किसी प्रकार का मोक्ष (मुक्ति) नहीं चाहिए और न ही कोई धन-संपदा चाहिए; मुझे तो बस सदा-सर्वदा संतों का सत्संग प्रदान कीजिए!
श्लोक 3
तुकाराम कहते हैं कि यदि ऐसी निष्काम भक्ति और संतों का संग मिलता रहे, तो प्रभु! मुझे बार-बार इस संसार में जन्म लेने के लिए सहर्ष भेज दीजिए!
श्लोक 4
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
वारकरी कीर्तन और धार्मिक सत्संग का औपचारिक समापन इसी अभंग 'हेचि दान देगा देवा' से होता है। भारतीय दर्शन में चार पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) में मोक्ष को सर्वोच्च माना गया है, परंतु वारकरी भक्ति मार्ग में 'प्रेम लक्षणा भक्ति' को मोक्ष से भी बढ़कर स्थान दिया गया है। तुकाराम महाराज कहते हैं कि यदि मोक्ष मिलने से भगवान की भक्ति और संतों का सत्संग छूट जाए, तो ऐसा मोक्ष हमें नहीं चाहिए। वे भगवान के प्रेम में बार-बार संसार में जन्म लेने को परम सुख मानते हैं।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Sant Tukaram · मध्यकालीन वारकरी संत · 17वीं शताब्दी, महाराष्ट्र
महाराष्ट्र के देहू ग्राम के वारकरी परंपरा के एक गृहस्थ-संत, जिन्होंने विठ्ठल की स्तुति में सरल, सीधी मराठी भाषा में हजारों अभंग (भक्ति पद) रचे, जिनमें प्रायः एक अनाज-व्यापारी के रूप में उनकी अपनी कठिनाइयों, शंकाओं एवं दैनिक संघर्षों का चित्रण मिलता है।
क्या आप जानते हैं?
मोक्ष से ऊपर भक्ति
तुकाराम महाराज स्पष्ट घोषणा करते हैं कि यदि मोक्ष मिलने से भगवान का कीर्तन और सत्संग समाप्त हो जाए, तो उन्हें ऐसा मोक्ष नहीं चाहिए।
कीर्तन का सार्वभौमिक समापन
जिस प्रकार संत ज्ञानेश्वर का 'पसायदान' संपूर्ण मानवता के कल्याण की प्रार्थना है, उसी प्रकार 'हेचि दान देगा देवा' प्रत्येक सत्संग की पूर्णता है।
गर्भवास का सहर्ष स्वीकार
पद ४ में तुकाराम जी कहते हैं कि प्रभु प्रेम के लिए यदि बार-बार जन्म भी लेना पड़े, तो वह भी हमारे लिए परम सुख का कारण है।
Vitthal
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