पसायदान – सार्वभौमिक कल्याण की प्रार्थना
यह एक प्रार्थना है जिसमें संत ज्ञानेश्वर ईश्वर से सभी प्राणियों के कल्याण, आपसी प्रेम, सद्गुणों की वृद्धि और संसार में सुख-शांति की कामना करते हैं। इसे 'पसायदान' कहा जाता है, अर्थात वह दान जो सबको समान रूप से मिले।
श्लोक
अब विश्वात्मा देव को इस वाक्ययज्ञ से संतुष्ट करूँ, वे संतुष्ट होकर मुझे यह पसायदान (कृपादान) प्रदान करें।
श्लोक 1
दुष्टों की विपत्तियाँ दूर हों, उनकी सत्कर्मों में रुचि बढ़े, और सभी प्राणियों में परस्पर मैत्री स्थापित हो।
श्लोक 2
पापों का अंधकार मिटे, संसार अपने स्वधर्म रूपी सूर्य को देखे, और प्रत्येक प्राणी जो चाहे वह प्राप्त करे।
श्लोक 3
ईश्वरनिष्ठ भक्तों की मंडलियाँ सदा कृपा बरसाएँ और पृथ्वीमंडल पर सभी प्राणियों से उनका निरंतर मिलन हो।
श्लोक 4
कल्पतरुओं के वन हों, चेतन चिंतामणियों के गाँव हों, और अमृत के समुद्र बोलते हों (सर्वत्र व्याप्त हों)।
श्लोक 5
चन्द्रमा कलंक रहित हों, सूर्य ताप रहित हों, और वे सभी सज्जन सदा हमारे सगे-संबंधी हों।
श्लोक 6
संक्षेप में, तीनों लोकों में सब सुखी और पूर्ण हों, और अखंड रूप से आदिपुरुष की भक्ति करें।
श्लोक 7
और इस ग्रंथ पर आश्रित रहने वाले लोग, विशेषकर इस लोक में, दृष्ट और अदृष्ट दोनों में विजयी हों।
श्लोक 8
यहाँ श्री विश्वेश्वर कहते हैं, यह दान-पसायदान (कृपादान) होगा, इस वरदान से ज्ञानदेव सुखी हुए।
श्लोक 9
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
यह प्रार्थना श्री ज्ञानेश्वर द्वारा रचित 'ज्ञानेश्वरी' (भगवद्गीता पर मराठी टीका) के अंत में आती है और 'पसायदान' के नाम से प्रसिद्ध है। परंपरा में इसे ग्रंथ के पाठ के समापन पर पढ़ा जाता है, जिसमें ईश्वर से सभी प्राणियों के कल्याण, मैत्री और सुख की प्रार्थना की गई है। यह एक सार्वभौमिक मंगलकामना है, जो किसी विशेष संप्रदाय तक सीमित नहीं है।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Sant Dnyaneshwar · मध्यकालीन वारकरी संत · 13वीं शताब्दी, महाराष्ट्र
मराठी दार्शनिक-संत, जिनके विषय में परंपरा कहती है कि उन्होंने किशोरावस्था में ही भगवद्गीता पर प्रसिद्ध मराठी टीका ज्ञानेश्वरी रची। उन्हें महाराष्ट्र की वारकरी (विठ्ठल-भक्त) परंपरा का आधारभूत व्यक्तित्व माना जाता है, तथा उनका पसायदान आज भी समस्त प्राणियों के कल्याण हेतु एक सार्वभौमिक प्रार्थना के रूप में पढ़ा जाता है।
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क्या आप जानते हैं?
रचना और संदर्भ
यह 'पसायदान' श्री ज्ञानेश्वर रचित 'ज्ञानेश्वरी' का समापन प्रार्थना है। 13वीं शताब्दी में रचित इस ग्रंथ में भगवद्गीता पर मराठी टीका है, और यह प्रार्थना संपूर्ण विश्व के कल्याण की कामना करती है।
प्रार्थना का स्वरूप
इसमें 9 श्लोक हैं, जिनमें ज्ञानेश्वर महाराज ईश्वर से सभी प्राणियों के लिए सुख, शांति, मैत्री और धर्म की प्रार्थना करते हैं। यह केवल व्यक्तिगत मोक्ष नहीं, बल्कि सार्वभौमिक कल्याण पर केंद्रित है।
विशेष मांग
तीसरे श्लोक में कहा गया है कि प्रत्येक प्राणी को वह मिले जो वह चाहता है – यह उदार दृष्टिकोण दर्शाता है। चौथे श्लोक में ईश्वरनिष्ठ लोगों की सभा की कल्पना है जो सदा मिलती रहे।
रूपक और कल्पना
पाँचवें श्लोक में कल्पतरु, चिंतामणि और अमृत के समुद्र जैसे रूपक हैं, जो आध्यात्मिक समृद्धि के प्रतीक हैं। छठे श्लोक में निष्कलंक चंद्रमा और तापरहित सूर्य की उपमा सज्जन मित्रों के लिए दी गई है।
समापन
अंतिम श्लोक में ज्ञानेश्वर कहते हैं कि इस प्रार्थना से वे स्वयं सुखी हुए। 'पसायदान' का अर्थ है 'प्रसाद रूप में वरदान' – यह ग्रंथ के अंत में दिया गया आशीर्वाद है।
Vitthal
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