वारकरी परंपरा की दैनिक उपासना: संत ज्ञानदेव के 28 अभंग, जो उपनिषदों के अद्वैत चिंतन को भगवान विट्ठल की भक्ति के साथ सामंजस्य में लाते हैं।
संत ज्ञानदेव का ‘रूप पाहता लोचनी’: विट्ठल के रूप के दर्शन का आनंद, अनेक जन्मों के सुकृत का फल, और समस्त सुखों का आगार।
पसायदान संत ज्ञानदेव की ज्ञानेश्वरी की समापन प्रार्थना है (अध्याय 18, ओवी 1794–1802), जिसमें सभी प्राणियों के कल्याण और मैत्री के लिए ईश्वर की कृपा माँगी गई है।