रूप पाहतां लोचनीं — संत ज्ञानेश्वर अभंग
वारकरी संप्रदाय के आधारस्तंभ संत ज्ञानेश्वर महाराज (माउली) का यह अत्यंत भावपूर्ण अभंग विट्ठल-दर्शन के परमानंद को प्रकट करता है। प्रभु विट्ठल के दिव्य श्यामल रूप को नेत्रों से निहारते ही हृदय में जो असीम सुख उमड़ पड़ता है, ज्ञानेश्वर जी कहते हैं कि यह कई जन्मों के पुण्यों का फल है और प्रभु विट्ठल ही समस्त सुखों के परम धाम हैं।
श्लोक
हे सखी (साजनी)! अपने इन नेत्रों से प्रभु विट्ठल के उस दिव्य रूप को निहारते ही मेरे हृदय में असीम परमानंद छा गया!
श्लोक 1
यही वह विट्ठल कितना सुंदर और कल्याणकारी है; यही वह साक्षात् माधव (श्रीकृष्ण) कितना परम प्रिय और मंगलमय है!
श्लोक 2
अनेक जन्मों के संचित पुण्यों और सत्कर्मों की अपार पूंजी मेरे पास थी, इसीलिए आज भगवान विट्ठल के चरणों में ऐसा अगाध प्रेम उत्पन्न हुआ है!
श्लोक 3
माता रुक्मिणी के प्राणनाथ भगवान विट्ठल ही संसार के समस्त सुखों और आनंद के मूल उद्गम (भंडार) हैं!
श्लोक 4
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
संत ज्ञानेश्वर (1275–1296) वारकरी भक्ति आंदोलन के प्राण और संस्थापक स्तंभ हैं। केवल 21 वर्ष की आयु में आलंदी में संजीवन समाधि लेने वाले ज्ञानेश्वर माउली ने श्रीमद्भगवद्गीता पर 'भावार्थदीपिका' (ज्ञानेश्वरी) जैसी महान टीका लिखी। 'रूप पाहतां लोचनीं' उनका सबसे प्रसिद्ध अभंग है, जिसमें वे विट्ठल को 'बरवा' (परम कल्याणकारी एवं सुंदर) कहते हैं और बताते हैं कि यह दर्शन किसी सांसारिक सुख का नहीं, बल्कि साक्षात् परब्रह्म के साक्षात्कार का चरम आनंद है।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Sant Dnyaneshwar · मध्यकालीन वारकरी संत · 13वीं शताब्दी, महाराष्ट्र
मराठी दार्शनिक-संत, जिनके विषय में परंपरा कहती है कि उन्होंने किशोरावस्था में ही भगवद्गीता पर प्रसिद्ध मराठी टीका ज्ञानेश्वरी रची। उन्हें महाराष्ट्र की वारकरी (विठ्ठल-भक्त) परंपरा का आधारभूत व्यक्तित्व माना जाता है, तथा उनका पसायदान आज भी समस्त प्राणियों के कल्याण हेतु एक सार्वभौमिक प्रार्थना के रूप में पढ़ा जाता है।
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क्या आप जानते हैं?
'बरवा' शब्द का माधुर्य
ज्ञानेश्वर जी ने विट्ठल के लिए प्राचीन मराठी शब्द बरवा (अत्यंत सुंदर, कल्याणप्रद) का प्रयोग किया है, जो सांसारिक सौंदर्य से परे दिव्य छवि को दर्शाता है।
सुकृतों की पूंजी (सुकृतांची जोडी)
इस पद में बताया गया है कि ईश्वर के प्रति सहज प्रेम और आकर्षण कोई आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि जन्म-जन्मांतर के सत्कर्मों और पुण्यों का सुफल है।
'बाप रखुमादेवीवर' मुद्रा
संत ज्ञानेश्वर अपने अभंगों के अंत में विट्ठल को 'रखुमाई (रुक्मिणी) के पति' कहकर अत्यंत आत्मीयता से स्मरण करते हैं।
Vitthal
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