जातां पंढरीसी सुख वाटे जीवा — संत सेना महाराज अभंग
संत सेना महाराज (14वीं शताब्दी) का यह अमर अभंग पंढरपुर की पावन पैदल वारी यात्रा का प्राणभूत गान है। संसार के समस्त ताप और संतापों को त्यागकर जैसे ही भक्त पंढरपुर के मार्ग पर आगे बढ़ता है, उसे जिस अलौकिक सुख की अनुभूति होती है, उसकी समता तीनों लोकों के किसी भी तीर्थ में नहीं है। लाखों संतों का गगनभेदी हरिनाम घोष, लहराती भगवा पताकाएं, पवित्र चंद्रभागा नदी, भक्त पुंडलिक और ईंट पर हाथ कमर पर रखे खड़े भगवान विठ्ठल—सेना जी कहते हैं कि जीवात्मा को इससे बढ़कर परम विश्रांति और आनंद संसार में कहीं प्राप्त नहीं हो सकता!
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