आनंदाचे डोहीं आनंद तरंग — संत तुकाराम अभंग
संत तुकाराम महाराज का यह अभंग अद्वैत भक्ति और ब्रह्मानंद की सर्वोच्च समाधि का साक्षात् गान है। जब जीवात्मा परमात्मा में लीन हो जाता है, तब समस्त द्वैत और सांसारिक अभाव समाप्त हो जाते हैं; चारों ओर केवल अखंड आनंद की लहरें ही उठती हैं। तुकाराम जी कहते हैं कि इस अनिर्वचनीय परम सुख को प्रकट करने में शब्द असमर्थ सिद्ध होते हैं।
श्लोक
आनंद के अथाह सरोवर में केवल आनंद की ही तरंगें उठ रही हैं; और उस आनंद का प्रत्येक अंग-प्रत्यंग केवल विशुद्ध आनंद ही है।
श्लोक 1
मैं क्या बताऊँ कि क्या अलौकिक घटित हुआ है? क्योंकि उस अनिर्वचनीय आनंद के सम्मुख ये सांसारिक शब्द अत्यंत तुच्छ और व्यर्थ सिद्ध होते हैं।
श्लोक 2
इस ब्रह्मानंद का माधुर्य कभी फीका नहीं पड़ता और न कभी समाप्त होता है; हम तो परम तृप्ति और संतुष्टि के अगाध सरोवर में आकंठ डूब गए हैं।
श्लोक 3
संत तुकाराम कहते हैं: अब हमारे जीवन में किसी भी वस्तु की कोई कमी नहीं रही; क्योंकि इस प्राप्त ब्रह्मानंद की न कोई सीमा है और न कोई अंत!
श्लोक 4
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
संत तुकाराम महाराज (1608–1650 ई.) वारकरी संत-परंपरा के मुकुटमणि हैं। अपने सांसारिक जीवन में भयंकर अकाल, पारिवारिक वियोग और सामाजिक उपेक्षा सहने के बाद जब तुकाराम जी को विट्ठल-कृपा से आत्म-साक्षात्कार हुआ, तब उनके मुख से यह अभंग फूटा। इसमें किसी बाह्य वस्तु की प्राप्ति का आनंद नहीं, अपितु आत्मा का अपने मूल सच्चिदानंद स्वरूप में लीन होने का अलौकिक उल्लास है।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Sant Tukaram · मध्यकालीन वारकरी संत · 17वीं शताब्दी, महाराष्ट्र
महाराष्ट्र के देहू ग्राम के वारकरी परंपरा के एक गृहस्थ-संत, जिन्होंने विठ्ठल की स्तुति में सरल, सीधी मराठी भाषा में हजारों अभंग (भक्ति पद) रचे, जिनमें प्रायः एक अनाज-व्यापारी के रूप में उनकी अपनी कठिनाइयों, शंकाओं एवं दैनिक संघर्षों का चित्रण मिलता है।
क्या आप जानते हैं?
आनंद ही ईश्वर का स्वरूप
प्रथम चरण में तुकाराम जी घोषणा करते हैं कि संपूर्ण सृष्टि और आत्मा आनंद के सरोवर में उठने वाली तरंगें हैं; आनंद ही परमात्मा का वास्तविक स्वरूप है।
उपनिषदों की गूँज
'बापुडे हे शब्द वाये' (ये शब्द तुच्छ और व्यर्थ हैं)—यह पंक्ति उपनिषद के 'यतो वाचो निवर्तन्ते' (जहाँ से वाणी लौट आती है) के भाव को हूबहू प्रकट करती है।
ध्यान और सत्संग का आधार
इस अभंग का पाठ मन को तत्काल समस्त सांसारिक व्यग्रताओं से मुक्त करके परम शांति और आनंद में स्थापित कर देता है।
Vitthal
हिन्दू धर्म से और
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