आतां कोठें धावे मन — संत तुकाराम अभंग
जगद्गुरु संत तुकाराम महाराज (17वीं शताब्दी) का यह अभंग अनन्य शरणागति और आत्मशांति का अमर गान है। ईंट पर खड़े श्री विठ्ठल के युगल चरणों के दर्शन करते ही मन का समस्त भटकाव और संसार की समस्त थकान सदा के लिए मिट गई है। अब जीवन में केवल परमानंद ही शेष है। भगवत्-प्रेम के रस में मन ऐसा तृप्त हुआ है कि वाणी पर नाम की मिठास बस गई है। तुकाराम जी कहते हैं कि हमारे लिए विठ्ठल ही जीवन का सच्चा और परिपूर्ण आधार हैं।
श्लोक
अब मेरा मन और कहां भटके, जब उसने आपके इन पावन युगल चरणों के दर्शन कर लिए हैं?
श्लोक 1
संसार की सारी थकान मिट गई, समस्त क्लेश दूर हो गए; और संपूर्ण जीवन में केवल परमानंद ही आनंद छा गया!
श्लोक 2
भगवत्-प्रेम के रस में ऐसा गहरा आलिंगन हुआ है कि मुख पर नाम की अगाध मिठास और रुचि सदा के लिए छा गई है।
श्लोक 3
तुकाराम कहते हैं: हम जैसे दीन साधकों के लिए श्री विठ्ठल ही जीवन का सच्चा, सर्वोपरि और पूर्ण आधार (माप) हैं!
श्लोक 4
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
संत तुकाराम जी की वाणी में भक्ति की चरम परिपक्वता और कृतार्थता की सुगंध है। मन स्वभाव से चंचल होता है और जब तक उसे ईश्वर के चरणों का आश्रय नहीं मिलता, उसका संताप समाप्त नहीं होता। विठ्ठल के चरणों का दर्शन होते ही जब मन स्थिर हो जाता है, तब साधक को सहज समाधि प्राप्त होती है। तुकाराम गाथा में यह अभंग क्रमांक 3746 पर है और कीर्तन तथा संगीत-सभाओं में आज भी गाया जाता है।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Sant Tukaram · मध्यकालीन वारकरी संत · 17वीं शताब्दी, महाराष्ट्र
महाराष्ट्र के देहू ग्राम के वारकरी परंपरा के एक गृहस्थ-संत, जिन्होंने विठ्ठल की स्तुति में सरल, सीधी मराठी भाषा में हजारों अभंग (भक्ति पद) रचे, जिनमें प्रायः एक अनाज-व्यापारी के रूप में उनकी अपनी कठिनाइयों, शंकाओं एवं दैनिक संघर्षों का चित्रण मिलता है।
क्या आप जानते हैं?
मन की स्थिरता का सूत्र
मन को जबरन रोकने के बजाय जब उसे भगवान के चरणों का दिव्य आनंद प्राप्त होता है, तो वह स्वतः स्थिर हो जाता है। यही इस अभंग का मूल उपदेश है।
गाथा में स्थान
तुकाराम गाथा में यह अभंग क्रमांक 3746 पर है; अंतिम चरण में तुकाराम जी विट्ठल को ही 'खरा माप' अर्थात् तृप्ति की कसौटी मानते हैं।
पुंडलिक की ईंट
'तुझे चरण देखिलिया' सुनते ही भक्त पुंडलिक द्वारा फेंकी गई ईंट पर 28 युगों से खड़े विठ्ठल का शांत स्वरूप आंखों के सामने साकार हो उठता है।
Vitthal
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