भेटी लागीं जीवा लागलीसे आस — संत तुकाराम अभंग
जगद्गुरु संत तुकाराम महाराज का यह कालजयी अभंग विरह-भक्ति और प्रभु-दर्शन की आर्त व्याकुलता की अमर पराकाष्ठा है। पूर्णिमा के चंद्रमा की राह देखता चकोर पक्षी, दिवाली पर मायके की बाट जोहती विरहिणी कन्या, और भूख से रोता हुआ अबोध बालक जो केवल अपनी माँ की प्रतीक्षा करता है—इन तीन मार्मिक दृष्टांतों से तुकोबा विट्ठल के दर्शन की प्यास प्रकट करते हैं।
श्लोक
हे प्रभु! मेरे प्राण आपके पावन मिलन के लिए अत्यंत व्याकुल हो उठे हैं; रात और दिन मेरी आँखें केवल आपकी ही राह देख रही हैं।
श्लोक 1
जिस प्रकार पूर्णिमा का चंद्रमा ही चकोर पक्षी का जीवन-प्राण है, ठीक उसी प्रकार मेरा व्याकुल मन आपके दर्शन की प्रतीक्षा कर रहा है।
श्लोक 2
जिस प्रकार ससुराल में ब्याही बेटी दिवाली के पर्व पर अपने मायके के बुलावे की बाट जोहती है, वैसे ही मैं पंढरपुर की पावन राह निहार रहा हूँ।
श्लोक 3
भूख से व्याकुल नन्हा बालक जिस तरह रो-रोकर केवल अपनी माँ की बाट जोहता है, ठीक वही दशा आपके बिना मेरी हो गई है!
श्लोक 4
तुकाराम कहते हैं: हे माँ विट्ठल! मुझे आपके दर्शन की तीव्र भूख लगी है; दौड़कर आइए और मेरे मुख में अपने दिव्य प्रेम-सुख का अमृत डाल दीजिए!
श्लोक 5
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
वारकरी संप्रदाय में प्रभु विट्ठल के दर्शन की जो तड़प है, वह केवल एक पूजा नहीं बल्कि जीवात्मा की अपने परम प्रियतम से मिलने की विरह-वेदना है। पंढरपुर की वारी यात्रा में सैकड़ों मील पैदल चलने वाले भक्तों के पैरों में जब छाले पड़ जाते हैं, तब यह अभंग उन्हें शक्ति देता है। इसमें तुकाराम जी ने विट्ठल को 'माउली' (परम कृपालु माँ) के रूप में पुकारा है।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Sant Tukaram · मध्यकालीन वारकरी संत · 17वीं शताब्दी, महाराष्ट्र
महाराष्ट्र के देहू ग्राम के वारकरी परंपरा के एक गृहस्थ-संत, जिन्होंने विठ्ठल की स्तुति में सरल, सीधी मराठी भाषा में हजारों अभंग (भक्ति पद) रचे, जिनमें प्रायः एक अनाज-व्यापारी के रूप में उनकी अपनी कठिनाइयों, शंकाओं एवं दैनिक संघर्षों का चित्रण मिलता है।
क्या आप जानते हैं?
चकोर का अनुपम दृष्टांत
भारतीय काव्य परंपरा में चकोर पक्षी केवल चंद्रमा की शीतल किरणों का अमृत पीकर जीवित रहता है; तुकाराम जी कहते हैं कि उनका मन भी केवल विट्ठल के दर्शन रूपी अमृत का प्यासा है।
मायके की दीपावली
महाराष्ट्र की लोक-संस्कृति में विवाहित कन्याएं दिवाली पर अपने मायके (माहेर) लौटने की तीव्र प्रतीक्षा करती हैं; तुकोबा के लिए पंढरपुर ही आत्मा का सच्चा मायका है।
आर्त पुकार
माँ के रूप में पुकारे गए ईश्वर के प्रति यह विरह की पुकार है; चकोर, मायके की प्रतीक्षा करती बेटी और भूखे शिशु के दृष्टांत बिना किसी व्याख्या के हर श्रोता के हृदय तक पहुँचते हैं।
Vitthal
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