यह भजन संत तुकाराम द्वारा रचित है, जिसमें प्रकृति के बीच एकान्त में रहने के आनंद का वर्णन है। पेड़-पौधे, पक्षी और वन्य जीव साथी बन जाते हैं, और हरि कथा ही भोजन बन जाती है।
संत तुकाराम का यह विदाई-अभंग है, जिसे परंपरा के अनुसार उनके वैकुंठ-प्रस्थान के समय गाया गया: अंतिम 'राम-राम' और जीवन के बंधनों से मुक्ति का उद्घोष।
संत तुकाराम का शरणागति में विश्राम देने वाला अभंग: विट्ठल के चरणों का दर्शन पाकर चंचल मन के लिए भटकने का कोई और ठिकाना नहीं रह जाता।
संत तुकाराम का अद्वैत आनंद का अभंग: आनंद के सरोवर में हर लहर आनंद ही है, और इस अनुभव के आगे शब्द मौन हो जाते हैं।
संत तुकाराम का विरह-भक्ति का अभंग: जैसे चकोर चंद्रमा के लिए और बालक माँ के लिए तरसता है, वैसे ही उनकी आत्मा विट्ठल के दर्शन की प्रतीक्षा करती है।
संत तुकाराम की विट्ठल से की गई संक्षिप्त प्रार्थना: वे एक ही वरदान माँगते हैं कि प्रभु का विस्मरण कभी न हो और संतों का संग मिले; मुक्ति या संपत्ति उनके लिए इससे बढ़कर नहीं।
संत तुकाराम का अभंग, जो सच्चे साधु की पहचान बताता है: जो दुःखी और पीड़ित जनों को अपना मानकर गले लगाता है, उसी में ईश्वर का वास है।
संत तुकाराम का आनंदमय अभंग, जिसमें चंद्रभागा के वाळवंट पर वैष्णव नाचते हैं और अहंकार त्यागकर एक-दूसरे के चरणों में प्रणाम करते हैं।
संत तुकाराम की लघुता की प्रार्थना: चींटी को शक्कर मिलती है जबकि विशाल ऐरावत अंकुश की मार सहता है, इसलिए विनम्रता ही श्रेष्ठ वरदान है।
संत तुकाराम का ध्यान-अभंग: ईंट पर कटि पर हाथ धरे खड़े, तुलसी-माला और पीतांबर धारी पंढरपुर के विट्ठल के सुंदर स्वरूप का भक्ति-पूर्ण वर्णन।
संत तुकाराम का नाम-संकीर्तन का अभंग: विट्ठल के गुण गाओ, उनका ध्यान करो और ईंट पर खड़े उन्हें देखो; उनके नाम से मुख मधुर हो जाता है।
तुकाराम गाथा का अभंग क्रमांक 2481: संत तुकाराम सृष्टि की एकता का उत्सव मनाते हैं; वृक्ष, वल्लरी और पक्षी जैसे आत्मीय जन आत्मा को विट्ठल के ध्यान की ओर ले जाते हैं।