Bharat Devotion
Embroidered artwork for खेळ मांडियेला वाळवंटीं घाई — संत तुकाराम अभंग: Embroidered Om symbol above a brass diya, marigolds and a temple spire at sunrise

खेळ मांडियेला वाळवंटीं घाई — संत तुकाराम अभंग

खेळ मांडियेला वाळवंटीं घाई — संत तुकाराम अभंग

संत तुकाराम महाराज का यह अत्यंत पावन अभंग पंढरपुर की चंद्रभागा नदी के रेतीले तट पर वैष्णव संतों के दिव्य नृत्य और संकीर्तन का सजीव चित्रण करता है। क्रोध और जातिगत अहंकार को पैरों तले कुचलकर सभी भक्त एक-दूसरे के चरणों में गिरते हैं; झांझ-मृदंग की गूँज में पुष्पवृष्टि होती है, जिससे भवसागर पार करने का मार्ग सुगम हो जाता है।

श्लोक

खेळ मांडियेला वाळवंटीं घाई नाचती वैष्णव भाई रे
Khela mandiyela valawantim ghai, nachati vaishnava bhai re

श्लोक 1

क्रोध अभिमान केला पावटणी एक एका लागतील पायीं रे
Krodha abhimana kela pavatani, eka eka lagatila payim re

श्लोक 2

गोपीचंदन उटी तुळशीच्या माळा हार मिरविती गळां रे
Gopichandana uti tulasichya mala, hara miraviti galam re

श्लोक 3

टाळ मृदंग घाई पुष्पवृष्टी होती अनुपम्य सुख तेथें रे
Tala mridanga ghai pushpavrushti hoti, anupamya sukha tethem re

श्लोक 4

तुका म्हणे सोपी केली पायवाट उतरावया भवघाट रे
Tuka mhane sopi keli payavata, utaravaya bhavaghata re

श्लोक 5

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

शुभ दिन व तिथि

नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर

उत्तम मुहूर्त / समय

ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल

पूजन सामग्री व अर्पण

शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ
  • मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार

पृष्ठभूमि

पंढरपुर की आषाढ़ी और कार्तिकी वारी यात्रा में जब लाखों श्रद्धालु पैदल चलकर पहुँचते हैं, तब चंद्रभागा नदी के रेतीले मैदान (वाळवंट) में यह दिव्य संकीर्तन मेला लगता है। तुकाराम जी कहते हैं कि यहाँ कोई धनी-निर्धन या ऊँच-नीच नहीं रहता; सब वैष्णव भाई बन जाते हैं। संतों ने इस पवित्र खेल द्वारा मोक्ष प्राप्ति के मार्ग को अत्यंत सहज और सुलभ बना दिया है।

इस पाठ के विषय में

रचयिता: Sant Tukaram · मध्यकालीन वारकरी संत · 17वीं शताब्दी, महाराष्ट्र

महाराष्ट्र के देहू ग्राम के वारकरी परंपरा के एक गृहस्थ-संत, जिन्होंने विठ्ठल की स्तुति में सरल, सीधी मराठी भाषा में हजारों अभंग (भक्ति पद) रचे, जिनमें प्रायः एक अनाज-व्यापारी के रूप में उनकी अपनी कठिनाइयों, शंकाओं एवं दैनिक संघर्षों का चित्रण मिलता है।

क्या आप जानते हैं?

अहंकार का मर्दन

द्वितीय पद में तुकाराम जी कहते हैं कि भक्तों ने क्रोध और अहंकार को पायदान बना दिया है और वे एक-दूसरे के चरणों में शीश नवाते हैं।

चंद्रभागा का वाळवंट

पंढरपुर की रेतीली भूमि को गर्भगृह के समान ही पावन माना जाता है क्योंकि वहाँ अनगिनत संतों के चरण-रज पड़ते हैं।

भवसागर पार करने की सुगम राह

अंतिम चरण में घोषणा की गई है कि संतों ने भक्ति का इतना सरल मार्ग बना दिया है कि कोई भी साधारण मनुष्य सहज ही मोक्ष प्राप्त कर सकता है।

Vitthal की संपूर्ण स्तुति एवं पाठ

Vitthal

Vitthal के सभी पाठ देखें →

हिन्दू धर्म से और

सभी देखें