काया ही पंढरी आत्मा हा विठ्ठल — संत एकनाथ अभंग
संत एकनाथ महाराज का यह सुप्रसिद्ध अभंग सगुण भक्ति और वेदांतिक अद्वैत दर्शन का परम समन्वय है। तीर्थ कहीं बाहर नहीं, स्वयं साधक के शरीर में ही प्रतिष्ठित है—यह मानव देह ही परम पावन पंढरी है, अंतरात्मा ही साक्षात् भगवान विट्ठल हैं, और सतत बहने वाली प्राण-चेतना ही पवित्र भीमा-चंद्रभागा नदी है।
श्लोक
यह मानव शरीर ही परम पावन पंढरपुर है; इसमें विराजमान अंतरात्मा ही साक्षात् भगवान विट्ठल हैं; और भीतर निरंतर प्रवाहित प्राण-चेतना ही पवित्र भीमा-चंद्रभागा नदी है।
श्लोक 1
देखिए! इस परम आंतरिक आत्म-साक्षात्कार में निवृत्तिनाथ, ज्ञानेश्वर, सोपानदेव, मुक्ताबाई और नामदेव—ये सभी महान संत एक ही अखंड चैतन्य में एकाकार हो गए हैं।
श्लोक 2
हृदय का अनन्य प्रेम-भाव ही सच्चा भक्त है; और आत्म-ज्ञान ही साक्षात् भगवान है; गुरु जनार्दन के दास एकनाथ का यही साक्षात् और प्रत्यक्ष अनुभव है!
श्लोक 3
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
संत एकनाथ (1533-1599) वारकरी भक्ति आंदोलन के महान समन्वयकारी संत थे। उन्होंने रूढ़िवादी कर्मकांडों और बाह्य आडंबरों को नकारते हुए अंतरात्मा की शुद्धि पर बल दिया। जब समाज केवल भौगोलिक यात्राओं को ही मुक्ति का साधन मानने लगा, तब एकनाथ जी ने समझाया कि असली तीर्थ तुम्हारे भीतर है। पंडित भीमसेन जोशी के गायन ने इस अभंग को भारतीय शास्त्रीय और भक्ति संगीत के इतिहास में अमर बना दिया।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Sant Eknath
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क्या आप जानते हैं?
अंतर्मुखी तीर्थ-दर्शन
संत एकनाथ ने पंढरपुर के भूगोल को साधक के शरीर में स्थापित किया है—मेरुदंड और प्राणशक्ति पवित्र भीमा नदी हैं, और अंतरात्मा ही स्वयं भगवान विट्ठल हैं।
संत-सम्मेलन का स्वरूप
दूसरे पद में एकनाथ जी बताते हैं कि जब साधक अपने अंतर्मन में स्थिर होता है, तो ज्ञानदेव, नामदेव, मुक्ताबाई आदि सभी संत उसी एक चेतना में विद्यमान दिखते हैं।
शास्त्रीय संगीत का गौरव
पंडित भीमसेन जोशी द्वारा गाया गया यह अभंग राग भैरवी में भारतीय शास्त्रीय संगीत का कालजयी रत्न माना जाता है।
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