दिव्य ज्योति की शाश्वत चिनगारी
संत एकनाथ का ‘काया ही पंढरी’: देह स्वयं पंढरपुर है, अंतर्यामी आत्मा विट्ठल है, और भक्ति भीमा नदी के रूप में बहती है।