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Embroidered artwork for ताटी उघडा ज्ञानेश्वरा — संत मुक्ताबाई अभंग: Embroidered Om symbol above a brass diya, marigolds and a temple spire at sunrise

ताटी उघडा ज्ञानेश्वरा — संत मुक्ताबाई अभंग

ताटी उघडा ज्ञानेश्वरा — संत मुक्ताबाई अभंग

संत मुक्ताबाई का यह ऐतिहासिक अभंग क्षमा, करुणा और सच्चे संतत्व की सर्वोच्च परिभाषा है। जब आलंदी के रूढ़िवादी पंडितों ने संत ज्ञानेश्वर का तिरस्कार किया, तो क्षुब्ध होकर ज्ञानेश्वर जी ने अपनी कुटिया की ताटी (घास-फूस का दरवाजा) अंदर से बंद कर ली। तब उनकी छोटी बहन मुक्ताबाई ने बाहर खड़े होकर उन्हें समझाया कि संत वह है जो संसार के कड़वे वचनों को अमृत समझकर पी जाए और विश्व के उद्धार के लिए द्वार खोले।

श्लोक

योगी पावन मनाचा साहे अपराध जनांचा विश्व रागें झालें वन्ही संतीं सुखें व्हावें पाणी शब्दशास्त्रें झालें क्लेश संतीं मानावा उपदेश विश्वपट ब्रह्मदोरा ताटी उघडा ज्ञानेश्वरा
Yogi pavan manacha, sahe aparadha janancha Vishva ragem jhale vanhi, santim sukhem vhave pani Shabdashastrem jhale klesha, santim manava upadesha Vishvapata brahmadora, tati ughada jnaneshvara

श्लोक 1

सुखसागरीं वास झाला उंचनीच काय त्याला अहो आपण जैसें व्हावें देवें तैसेंचि करावें ऐसा नटनाट्य खेळ स्थिर नाहीं एक वेळ एकापासोनी अनेक झालें त्यासी पाहिजे सांभाळिलें शून्य साक्षित्वें समजावें वेद ओंकाराच्या नावें एकें उंचपण केलें एक अभिमानें गेलें इतुकें टाकुनी शांति धरा ताटी उघडा ज्ञानेश्वरा
Sukhasagari vasa jhala, unchanicha kaya tyala Aho apana jaisem vhave, devem taisenchi karave Aisa natanatya khela, sthira nahi eka vela Ekapasoni aneka jhale, tyasi pahije sambhalile Shunya sakshitvem samajave, veda onkarachya navem Ekem unchapana kele, eka abhimanem gele Itukem takuni shanti dhara, tati ughada jnaneshvara

श्लोक 2

वरी भगवा झाला नामें अंतरीं वश्य केला कामें त्याला म्हणों नये साधू जगीं विटंबना बाधू आपआपणा शोधुनी घ्यावें विवेक नांदे त्याच्यासवें आशा दंभ अवघे आवरा ताटी उघडा ज्ञानेश्वरा
Vari bhagava jhala namem, antarim vashya kela kamem Tyala mhano naye sadhu, jagi vitambana badhu Apapana shodhuni ghyave, viveka nande tyachyasave Asha dambha avaghe avara, tati ughada jnaneshvara

श्लोक 3

संत तोचि जाणा जगीं दया क्षमा ज्याचे अंगीं लोभ अहंता नये मना जगीं विरक्त तोचि जाणा इहपरलोकीं सुखी शुद्ध ज्ञान ज्याचे मुखीं मिथ्या कल्पना मागें सारा ताटी उघडा ज्ञानेश्वरा
Santa tochi jana jagi, daya kshama jyache angi Lobha ahamta naye mana, jagi virakta tochi jana Ihaparalokim sukhi, shuddha jnana jyache mukhi Mithya kalpana magem sara, tati ughada jnaneshvara

श्लोक 4

एक आपण साधू झाले येर कोण वायां गेले उठे विकार ब्रह्मीं मूळ अवघें मायेचें गाबाळ माया नुरे जेव्हां विश्वब्रह्म होईल तेव्हां ऐसा उमज आदि-अंतीं मग सुखी व्हावें संतीं चिंता क्रोध मागें सारा ताटी उघडा ज्ञानेश्वरा
Eka apana sadhu jhale, yera kona vaya gele Uthe vikara brahmim mula, avaghem mayechem gabala Maya nure jevha, vishvabrahma hoila tevha Aisa umaja adi-antim, maga sukhi vhave santim Chinta krodha magem sara, tati ughada jnaneshvara

श्लोक 5

ब्रह्म जैसें तैसापरी आम्हां वडील भूतें सारी हात आपुला आपणा लागे त्याचा करूं नये खेद जीभ दातांनी चाविली कोणे बत्तिशी पाडिली थोर दुखावलें मन पुढें उदंड शहाणे चणे खावे लोखंडाचे मग ब्रह्मपदीं नाचे मन मारूनी उन्मन करा ताटी उघडा ज्ञानेश्वरा
Brahma jaisem taisapari, amha vadila bhutem sari Hata apula apana lage, tyacha karu naye kheda Jibha datanni chavili, kone battishi padili Thora dukhavalem mana, pudhem udanda shahane Chane khave lokhandache, maga brahmapadi nache Mana maruni unmana kara, tati ughada jnaneshvara

श्लोक 6

सुखसागर आपण व्हावें जग बोधें निववावें बोधा करूं नये अंतर साधू नाहीं आपपर जीव जिवासी पैं द्यावा मग करूं नये हेवा तरणोपाय चित्तीं धरा ताटी उघडा ज्ञानेश्वरा
Sukhasagara apana vhave, jaga bodhem nivavave Bodha karu naye antara, sadhu nahi apapara Jiva jivasi paim dyava, maga karu naye heva Taranopaya chittim dhara, tati ughada jnaneshvara

श्लोक 7

अहो क्रोधें यावें कोठें अवघें आपण निघोटें ऐसें कळलें उत्तम जन तेचि जनार्दन ब्रीद बांधिलें चरणीं न ये दाविता करणी वेळ क्रोधाचा उगवला अवघा योग फोल झाला ऐसी थोर दृष्टी धरा ताटी उघडा ज्ञानेश्वरा
Aho krodhem yave kothem, avaghem apana nighotem Aisem kalalem uttama, jana techi janardana Brida bandhilem charani, na ye davita karani Vela krodhacha ugavala, avagha yoga phola jhala Aisi thora drishti dhara, tati ughada jnaneshvara

श्लोक 8

सांडीं कल्पना उपाधी तीच साधूला समाधी वाद घालावा कवणाला अवघा द्वैताचा हो घाला पुढें उमजेना काय उडत्याचे खालीं पाय एक मन चेष्टा करी भूतें बापुडीं शेजारीं अवघी ईश्वराची करणी काय तेथें केलें कोणी पुनः शुद्ध मार्ग धरा ताटी उघडा ज्ञानेश्वरा
Sandi kalpana upadhi, ticha sadhula samadhi Vada ghalava kavanala, avagha dvaitacha ho ghala Pudhem umajena kaya, udatyache khali paya Eka mana cheshta kari, bhutem bapudi shejari Avaghi ishvarachi karani, kaya tethe kele koni Punah shuddha marga dhara, tati ughada jnaneshvara

श्लोक 9

गिरिगव्हारें कशासाठीं रागें पुरविली पाठीं ऐसा नसावा संन्यासी परमार्थाचा जो का द्वेषी घर बांधिलें डोंगरीं विषया हिंडे दारोदारीं काय केला योगधर्म नाहीं अंतरीं निष्काम गंगाजळ हृदय करा ताटी उघडा ज्ञानेश्वरा
Girigavharem kashasathi, ragem puravili pathi Aisa nasava sannyasi, paramarthacha jo ka dveshi Ghara bandhilem dongari, vishaya hinde darodari Kaya kela yogadharma, nahi antari nishkama Gangajala hridaya kara, tati ughada jnaneshvara

श्लोक 10

शुद्ध ज्याचा भाव झाला दुरी नाहीं देव त्याला अवघीं साधनें हातवटी मोल मिळत नाहीं हाटीं अहो आपण तैसें व्हावें अवघें अनुमानोनी घ्यावें ऐसें केलें सद्‌गुरुनाथें बाप रखुमादेवीकांतें तेथें कोणी शिकवावें सार साधुनिया घ्यावें लडिवाळ मुक्ताबाई जीव मुद्दल ठायींचे ठायीं तुम्ही तरून विश्व तारा ताटी उघडा ज्ञानेश्वरा
Shuddha jyacha bhava jhala, duri nahi deva tyala Avaghi sadhanem hatavati, mola milata nahi hati Aho apana taisem vhave, avaghem anumanoni ghyave Aisem kelem sadgurunathem, bapa rakhumadevikantem Tethe koni shikavave, sara sadhuniya ghyave Ladivala muktabai, jiva muddala thayinche thayi Tumhi taruna vishva tara, tati ughada jnaneshvara

श्लोक 11

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

शुभ दिन व तिथि

नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर

उत्तम मुहूर्त / समय

ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल

पूजन सामग्री व अर्पण

शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ
  • मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार

पृष्ठभूमि

संत ज्ञानेश्वर, निवृत्तिनाथ, सोपानदेव और मुक्ताबाई चारों अनाथ भाई-बहनों को समाज के घोर बहिष्कार और अपमान का सामना करना पड़ा था। जब ज्ञानेश्वर जी आलंदी में भिक्षा माँगने गए, तो लोगों ने उन्हें झिड़क कर भगा दिया। क्षुब्ध होकर ज्ञानेश्वर ने अपनी कुटिया का दरवाजा बंद कर लिया। तब लगभग दस वर्ष की छोटी बहन मुक्ताबाई ने कुटिया के बाहर खड़े होकर यह 'ताटीचा अभंग' (दरवाजा खोलने का पद) गाया। इस ज्ञानोपदेश से प्रेरित होकर ज्ञानेश्वर जी ने द्वार खोला और संपूर्ण मानवता को 'ज्ञानेश्वरी' तथा 'पसायदान' का अमृत प्रदान किया।

इस पाठ के विषय में

रचयिता: Sant Muktabai

क्या आप जानते हैं?

ताटी का अर्थ

'ताटी' बाँस और घास-फूस की बनी उस चटाई या टट्टी को कहते हैं जो ग्रामीण महाराष्ट्र में झोपड़ी के दरवाजे के रूप में प्रयुक्त होती थी।

संतत्व की कसौटी

प्रथम चरण 'संत जेणें व्हावें, जग बोलणें सोसावें' भारतीय दर्शन का अमर सूत्र है कि संत वही है जो संसार के आघातों को सहकर भी केवल करुणा बरसाए।

अमृत वचन

तृतीय पद में मुक्ताबाई कहती हैं कि यदि सारा संसार क्रोध की आग में जल रहा हो, तो भी संत को पानी के समान शीतल रहकर शत्रु के प्रति भी अमृत ही बोलना चाहिए।

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