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Embroidered artwork for जे का रंजले गांजले — संत तुकाराम अभंग: Embroidered Om symbol above a brass diya, marigolds and a temple spire at sunrise

जे का रंजले गांजले — संत तुकाराम अभंग

जे का रंजले गांजले — संत तुकाराम अभंग

संत तुकाराम महाराज का यह अत्यंत प्रसिद्ध और प्रेरक अभंग सच्चे साधु और मानवता की पहचान कराता है। तुकोबा कहते हैं कि जो दुःखी, पीड़ित और निराश्रित लोगों को अपना मानकर गले लगाता है, वही सच्चा संत है और उसी के भीतर साक्षात् परमात्मा का वास होता है।

श्लोक

जे का रंजले गांजले त्यासि म्हणे जो आपुलें तोचि साधू ओळखावा देव तेथेंचि जाणावा
Je ka ranjale ganjale, tyasi mhane jo aapule Tochi sadhu olakhawa, dev tethechi janawa

श्लोक 1

मृदु सबाह्य नवनीत तैसें सज्जनाचें चित्त ज्यासि आपंगिता नाहीं त्यासि धरी जो हृदयीं
Mrudu sabāhya navaneeta, taise sajjanāche chitta Jyāsi āpangitā nāhī, tyāsi dharī jo hrudayī

श्लोक 2

दया करणें जें पुत्रासी तेचि दासा आणि दासी तुका म्हणे सांगूं किती तोचि भगवंताची मूर्ती
Dayā karane je putrāsi, techi dāsā āni dāsī Tukā mhane sāngu kiti, tochi bhagavantāchi moorti

श्लोक 3

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

शुभ दिन व तिथि

नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर

उत्तम मुहूर्त / समय

ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल

पूजन सामग्री व अर्पण

शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ
  • मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार

पृष्ठभूमि

संत तुकाराम (1608–1650) महाराष्ट्र के वारकरी भक्ति आंदोलन के महान संत-कवि थे, जिनका संपूर्ण जीवन पंढरपुर के भगवान विट्ठल की भक्ति में समर्पित था। तुकाराम गाथा का अभंग क्रमांक २०४ 'जे का रंजले गांजले' भक्ति आंदोलन का नैतिक शिखर माना जाता है। तुकाराम महाराज ने स्पष्ट किया कि कर्मकांड और बाह्य आडंबरों के बजाय दीन-दुखियों की सेवा और समदृष्टि ही सच्ची ईश्वरीय आराधना है। महात्मा गांधी इस अभंग से अत्यंत प्रभावित थे और उन्होंने 1930 में यरवदा जेल में इसका अंग्रेजी अनुवाद किया था, जिसे उन्होंने 'दरिद्रनारायण की सेवा' के अपने दर्शन का मूल आधार बनाया।

इस पाठ के विषय में

रचयिता: Sant Tukaram · मध्यकालीन वारकरी संत · 17वीं शताब्दी, महाराष्ट्र

महाराष्ट्र के देहू ग्राम के वारकरी परंपरा के एक गृहस्थ-संत, जिन्होंने विठ्ठल की स्तुति में सरल, सीधी मराठी भाषा में हजारों अभंग (भक्ति पद) रचे, जिनमें प्रायः एक अनाज-व्यापारी के रूप में उनकी अपनी कठिनाइयों, शंकाओं एवं दैनिक संघर्षों का चित्रण मिलता है।

क्या आप जानते हैं?

महात्मा गांधी का आदर

1930 में यरवदा जेल में कारावास के दौरान महात्मा गांधी ने इस अभंग का अंग्रेजी अनुवाद अपनी पुस्तक सॉन्ग्स फ्रॉम प्रिज़न में किया था। उन्होंने इसे 'दरिद्रनारायण' (दीन-दुखियों में ईश्वर दर्शन) के अपने जीवन-दर्शन का मूल आधार माना।

तुकाराम गाथा क्र. २०४

संत तुकाराम के प्रामाणिक काव्य संग्रह 'तुकाराम गाथा' में यह अभंग क्रमांक २०४ पर दर्ज है, जिसे 'साधु लक्षण' (सच्चे संत की वास्तविक पहचान) का सर्वोत्तम प्रमाण माना जाता है।

नवनीत (मक्खन) का रूपक

तुकाराम महाराज ने सज्जन के हृदय की तुलना ताजे मक्खन से की है (मृदु सबाह्य नवनीत), जो यह दर्शाता है कि एक सच्चे संत की करुणा भीतर और बाहर से पूर्णतः निष्कपट और एकसमान कोमल होती है।

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