आम्ही जातो आपुल्या गांवा — संत तुकाराम अभंग
संत तुकाराम महाराज का यह परम पावन विदाई-पद है। जब वे इस नश्वर संसार को छोड़कर सदेह वैकुंठ-प्रस्थान कर रहे थे, तब उन्होंने समस्त भक्तों और संसार को अपना अंतिम 'राम-राम' (प्रणाम) कहा। जन्म-मरण के बंधन से सदा के लिए मुक्त होकर वे अपने मूल धाम (निजधाम) लौट रहे हैं और भगवान की आज्ञा-पालन को ही अपना एकमात्र कर्तव्य बताते हैं।
श्लोक
हम अब अपने मूल सनातन धाम (वैकुंठ) की ओर जा रहे हैं; आप सभी हमारा यह अंतिम प्रेमपूर्ण 'राम-राम' (प्रणाम) स्वीकार करें।
श्लोक 1
इस नश्वर संसार में आपकी और हमारी यह अंतिम भेंट है; यहाँ से अब इस सांसारिक बंधन की समस्त गाँठें सदा के लिए खुल गई हैं।
श्लोक 2
अब जन्म और मरण के चक्र में पुनः आना-जाना समाप्त हो गया है; हम अपने मूल नित्य निजधाम (परमपद) की ओर प्रस्थान कर रहे हैं।
श्लोक 3
संत तुकाराम कहते हैं: अब सारा भार उस कृपालु प्रभु पर ही है; हमने तो केवल उनकी दिव्य आज्ञा का विनम्रतापूर्वक पालन किया है।
श्लोक 4
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
वारकरी परंपरा के अनुसार संत तुकाराम जी का पार्थिव शरीर पंचतत्व में विलीन नहीं हुआ, अपितु फाल्गुन वद्य द्वितीया (तुकाराम बीज) के दिन साक्षात् वैकुंठ से आए विमान में बैठकर वे सदेह वैकुंठ पधारे थे। देहू में इंद्रायणी नदी के पावन तट पर प्रस्थान के समय उन्होंने यह अंतिम अभंग गाकर सभी से विदा ली थी। यह पद ईश्वर-शरण और जीवन की नश्वरता का अद्वितीय साक्षी है।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Sant Tukaram · मध्यकालीन वारकरी संत · 17वीं शताब्दी, महाराष्ट्र
महाराष्ट्र के देहू ग्राम के वारकरी परंपरा के एक गृहस्थ-संत, जिन्होंने विठ्ठल की स्तुति में सरल, सीधी मराठी भाषा में हजारों अभंग (भक्ति पद) रचे, जिनमें प्रायः एक अनाज-व्यापारी के रूप में उनकी अपनी कठिनाइयों, शंकाओं एवं दैनिक संघर्षों का चित्रण मिलता है।
क्या आप जानते हैं?
तुकाराम बीज का पावन पर्व
प्रतिवर्ष फाल्गुन वद्य द्वितीया को देहू में भक्त इस विदाई अभंग का सामूहिक गायन करके तुकाराम जी के वैकुंठ-गमन का स्मरण करते हैं।
'राम-राम' का पावन अभिवादन
महाराष्ट्र की संस्कृति में 'राम-राम' मिलना और बिछुड़ना दोनों में ईश्वर को साक्षी मानकर किया जाने वाला पवित्र नमस्कार है।
कर्म-गाँठ का टूटना
द्वितीय चरण में 'येथुनियां तुटली गांठी' (यहाँ से संसार की गाँठ टूट गई) वाक्य जीव के समस्त प्रारब्ध और जन्म-मरण से मुक्ति का प्रतीक है।
Vitthal
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