उठो पांडुरंग, अब सबको दर्शन दो — श्री विट्ठल काकड़ आरती
विट्ठल को भोर में प्रेम से जगाने वाली काकड़ आरती, जिसमें 'तुका म्हणे' की छाप है और जो इसलिए संत तुकाराम की मानी जाती है; पंढरपुर और महाराष्ट्र में गाई जाती है।
श्लोक
हे पांडुरंग! अब जागिए और हम समस्त भक्तों को अपने दिव्य दर्शन दीजिए; पूर्व दिशा में अरुणोदय हो चुका है और अब निद्रा का समय समाप्त हो गया है!
श्लोक 1
परम आनंदित होकर आपके बालगोपाल सखा आ पहुँचे हैं; वे आपके भोग के लिए दही-भात और ताजा मक्खन लेकर प्रतीक्षा में खड़े हैं।
श्लोक 2
पवित्र चंद्रभागा नदी के रेतीले तट पर सहस्रों वैष्णव भक्त एकत्र हो गए हैं; वे झांझ और मृदंग की मधुर ध्वनि पर आपके पावन नाम का जयघोष कर रहे हैं।
श्लोक 3
संत तुकाराम कहते हैं: हे प्रभु, अब आप रत्नजड़ित सिंहासन पर विराजिए; हम दोनों हाथ जोड़कर परम प्रेम से आपकी यह मंगल आरती उतारते हैं।
श्लोक 4
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
काकड़ आरती वारकरी परंपरा की प्रातःकालीन उपासना है, जिसमें दिन के आरंभ से पहले भगवान को जगाया, स्तुति की जाती है और दीपों से आरती उतारी जाती है। 'काकड़ा' घी में भीगी मोटी सूती बत्ती को कहते हैं, जिसे देवता के सामने गोल घुमाया जाता है। संत तुकाराम (१६०८–१६५०), संत रामदास और संत एकनाथ आदि संतों को काकड़ आरतियों का रचयिता माना जाता है। यह आरती 'तुका म्हणे देवा आतां बैसा सिंहासनीं' इस हस्ताक्षर-पंक्ति पर समाप्त होती है, जिसके कारण परंपरा से इसे संत तुकाराम की रचना माना जाता है; लगभग ४,५०० क्रमांकित अभंगों वाली मुद्रित गाथा में इसका ठीक-ठीक स्थान निश्चित रूप से स्थापित नहीं है, क्योंकि यही आरंभ मुद्रित गाथा से बाहर प्रचलित अन्य गाए जाने वाले रूपों में भी मिलता है। इसमें विट्ठल को दूर के देवता के बजाय प्रिय बालक की तरह धीरे से जगाया जाता है; बालगोपाल दही-भात और ताजा मक्खन लेकर आते हैं, और वैष्णव चंद्रभागा की रेत पर एकत्र होते हैं।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Sant Tukaram · मध्यकालीन वारकरी संत · 17वीं शताब्दी, महाराष्ट्र
महाराष्ट्र के देहू ग्राम के वारकरी परंपरा के एक गृहस्थ-संत, जिन्होंने विठ्ठल की स्तुति में सरल, सीधी मराठी भाषा में हजारों अभंग (भक्ति पद) रचे, जिनमें प्रायः एक अनाज-व्यापारी के रूप में उनकी अपनी कठिनाइयों, शंकाओं एवं दैनिक संघर्षों का चित्रण मिलता है।
क्या आप जानते हैं?
प्रभात-पूजा
काकड़ आरती सूर्योदय से पहले गाई जाती है। पहला पद कहता है कि अरुणोदय हो गया और निद्रा की वेला बीत गई है, और पांडुरंग से उठकर सबको दर्शन देने की प्रार्थना करता है।
काकड़ा बत्ती
इस विधि में घी में भीगी मोटी सूती बत्तियों को देवता के सामने गोल घुमाया जाता है, जो दर्शन की भोर से पहले अंधकार के मिटने का प्रतीक है।
माखन-दही का बाल-भोग
आरती में बालगोपालों द्वारा दही-भात और ताजा मक्खन अर्पित करने का वर्णन है, जो पंढरपुर को वृंदावन की बाल-लीलाओं से जोड़ता है।
Vitthal
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