आठ सौ वर्षों की वारकरी यात्रा
अद्वैत भक्ति
विट्ठल-रुक्मिणी मंदिर
पंढरपुर के विट्ठल की संध्या आरती, जो परंपरा से संत नामदेव की मानी जाती है; ईंट पर खड़े विट्ठल और वामांग में रखुमाई का गुणगान।
विट्ठल को भोर में प्रेम से जगाने वाली काकड़ आरती, जिसमें 'तुका म्हणे' की छाप है और जो इसलिए संत तुकाराम की मानी जाती है; पंढरपुर और महाराष्ट्र में गाई जाती है।
वारकरी परंपरा की दैनिक उपासना: संत ज्ञानदेव के 28 अभंग, जो उपनिषदों के अद्वैत चिंतन को भगवान विट्ठल की भक्ति के साथ सामंजस्य में लाते हैं।
संत ज्ञानदेव का ‘रूप पाहता लोचनी’: विट्ठल के रूप के दर्शन का आनंद, अनेक जन्मों के सुकृत का फल, और समस्त सुखों का आगार।
संत एकनाथ का ‘माझे माहेर पंढरी’: पंढरपुर एक विवाहित पुत्री का प्रिय मायका है, जहाँ विट्ठल और रखुमाई माता-पिता हैं और पुंडलीक भाई हैं।
संत गोरा कुंभार का अभंग: निर्गुण निराकार परब्रह्म सगुण रूप में भगवान से मिलता है, देह-भाव विलीन हो जाता है, और विट्ठल सर्वत्र व्याप्त हो जाते हैं।
संत जनाबाई का अभंग: प्रेम की रस्सी से वे पंढरपुर के चोर को बाँध लेती हैं, विट्ठल को अपने हृदय के कारागार में बंद कर देती हैं और उन्हें कभी जाने नहीं देतीं।
संत जनाबाई की विट्ठल-माता से कोमल प्रार्थना: पंढरपुर की नदियों पर आओ और मेरे आँगन में नाचो, क्योंकि मेरा आनंद तुम्हारे गुणों में है।
संत सेना का तीर्थयात्रा-गीत: पंढरपुर की राह का आनंद, जिसके समान तीनों लोकों में कोई दूसरी तीर्थयात्रा नहीं।
वारकरी परंपरा के संत सेना नाई (14वीं शताब्दी) का यह अतिप्रसिद्ध अभंग है। अपने नाई के व्यवसाय को ही उन्होंने आध्यात्मिक साधना का माध्यम बनाया। वे कहते हैं कि हम परम भाग्यशाली हैं जो केवल विट्ठल के दास हैं; हाथ में दर्पण लेकर वे आत्मस्वरूप का दर्शन कराते हैं और कैंची से अहंकार का मुंडन करते हैं।
संत तुकाराम का विरह-भक्ति का अभंग: जैसे चकोर चंद्रमा के लिए और बालक माँ के लिए तरसता है, वैसे ही उनकी आत्मा विट्ठल के दर्शन की प्रतीक्षा करती है।
संत तुकाराम की लघुता की प्रार्थना: चींटी को शक्कर मिलती है जबकि विशाल ऐरावत अंकुश की मार सहता है, इसलिए विनम्रता ही श्रेष्ठ वरदान है।
संत तुकाराम का ध्यान-अभंग: ईंट पर कटि पर हाथ धरे खड़े, तुलसी-माला और पीतांबर धारी पंढरपुर के विट्ठल के सुंदर स्वरूप का भक्ति-पूर्ण वर्णन।