लहानपण देगा देवा — संत तुकाराम अभंग
जगद्गुरु संत तुकाराम महाराज (17वीं शताब्दी) का यह अभंग आध्यात्मिक विनम्रता और निरहंकारिता का अमर उपदेश है। तुकाराम जी ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि 'हे प्रभु, मुझे बड़प्पन नहीं, बल्कि लघुता (छोटापन) दीजिए!' क्योंकि मीठी चीनी का कण छोटी सी चींटी को प्राप्त होता है, जबकि ऐरावत जैसे विशालकाय हाथी को अंकुश की मार सहनी पड़ती है। बड़प्पन में पीड़ा है, जबकि विनम्रता में ईश्वरीय आनंद है।
श्लोक
हे प्रभु, मुझे छोटापन (विनम्रता) का वरदान दीजिए! देखिए, छोटी सी चींटी किस प्रकार मीठी चीनी का कण सहजता से आनंदपूर्वक खाती है।
श्लोक 1
इंद्र का हाथी ऐरावत कितना विशाल और चौदह रत्नों में श्रेष्ठ रत्न माना जाता है, फिर भी उसे सिर पर महावत के तीक्ष्ण अंकुश की मार सहनी पड़ती है।
श्लोक 2
जिस किसी के पास संसार का बड़प्पन और अहंकार होता है, उसे उसी अनुपात में कठिन यातनाएं और मानसिक क्लेश भोगने पड़ते हैं।
श्लोक 3
संत तुकाराम कहते हैं: इस परम सत्य को भली-भाँति जान लो, और प्रभु के चरणों में छोटे से भी छोटा (अत्यंत विनम्र) बनकर रहो।
श्लोक 4
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
संत तुकाराम जी वारकरी संप्रदाय के शिखर हैं। संसार में मनुष्य मान-प्रतिष्ठा, पद और धन के झूठे बड़प्पन के पीछे भागता है, जो केवल अहंकार और क्लेश को जन्म देता है। तुकाराम जी ने चींटी और ऐरावत का अत्यंत व्यावहारिक उदाहरण देकर यह अमर सत्य स्थापित किया कि ईश्वर के सम्मुख जो जितना छोटा और निरहंकारी बनता है, वह उतना ही भगवत्कृपा का पात्र बनता है।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Sant Tukaram · मध्यकालीन वारकरी संत · 17वीं शताब्दी, महाराष्ट्र
महाराष्ट्र के देहू ग्राम के वारकरी परंपरा के एक गृहस्थ-संत, जिन्होंने विठ्ठल की स्तुति में सरल, सीधी मराठी भाषा में हजारों अभंग (भक्ति पद) रचे, जिनमें प्रायः एक अनाज-व्यापारी के रूप में उनकी अपनी कठिनाइयों, शंकाओं एवं दैनिक संघर्षों का चित्रण मिलता है।
क्या आप जानते हैं?
चींटी और हाथी का अमर दृष्टांत
तुकाराम जी द्वारा दिया गया चींटी और ऐरावत हाथी का उदाहरण भारतीय नीति और अध्यात्म के सबसे प्रसिद्ध दृष्टांतों में गिना जाता है।
अहंकार की व्यर्थता
सांसारिक बड़प्पन अंकुश की मार दिलाता है, जबकि प्रभु-भक्ति की सच्ची मिठास केवल वही पा सकता है जो स्वयं को तुच्छ और दास मानकर समर्पित होता है।
कीर्तन का प्राण
वारकरी संप्रदाय के प्रत्येक कीर्तन में यह अभंग साधकों के मन से अहंकार को मिटाने के लिए विशेष रूप से गाया जाता है।
Vitthal
हिन्दू धर्म से और
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