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Embroidered artwork for कांदा मुळा भाजी — संत सावता माळी अभंग: Embroidered Om symbol above a brass diya, marigolds and a temple spire at sunrise

कांदा मुळा भाजी — संत सावता माळी अभंग

कांदा मुळा भाजी — संत सावता माळी अभंग

संत सावता माली जी का यह अनुपम अभंग भारतीय कर्मयोग का सर्वोच्च भक्तिमय स्वरूप है। भगवान की प्राप्ति के लिए गृहस्थ जीवन और अपने कर्म को छोड़ने की आवश्यकता नहीं है। सावता जी अपनी सब्जी की बाड़ी में हल जोतते और सिंचाई करते हुए कहते हैं—'प्याज, मूली, लहसुन, मिर्च और धनिया—ये सब साक्षात् मेरी माता विठ्ठल और श्रीहरि ही हैं!' कर्म ही उनकी पंढरपुर की तीर्थयात्रा बन गया।

श्लोक

कांदा मुळा भाजी अवघी विठाबाई माझी
Kanda mula bhaji, avaghi vithabai majhi

श्लोक 1

लसूण मिरची कोथिंबिरी अवघा झाला माझा हरी
Lasuna mirachi kothimbiri, avagha jhala majha hari

श्लोक 2

मोट नाडा विहीर दोरी अवघी व्यापिली पंढरी
Mota nada vihira dori, avaghi vyapili pandhari

श्लोक 3

सावता म्हणे केला मळा विठ्ठल पायीं गोविला गळा
Savata mhane kela mala, vitthala payim govila gala

श्लोक 4

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

शुभ दिन व तिथि

नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर

उत्तम मुहूर्त / समय

ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल

पूजन सामग्री व अर्पण

शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ
  • मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार

पृष्ठभूमि

संत सावता माली (1250–1295 ई.) संत ज्ञानेश्वर के समकालीन परम सिद्ध संत थे। वे सोलापुर जिले के अरण गाँव में रहते थे और किसानी तथा सब्जी उगाना उनकी आजीविका थी। आश्चर्य की बात यह है कि सावता जी अपने पूरे जीवन में कभी पंढरपुर की यात्रा पर नहीं गए; उनका अटूट विश्वास था कि यदि मन पवित्र हो और कर्म को ही ईश्वर की पूजा माना जाए, तो पांडुरंग स्वयं भक्त के पास चले आते हैं। संत ज्ञानेश्वर और नामदेव जी स्वयं उनसे मिलने अरण गए थे।

इस पाठ के विषय में

रचयिता: Sant Savata Mali

क्या आप जानते हैं?

पंढरपुर न जाने वाले संत

सावता माली वारकरी इतिहास के ऐसे विलक्षण संत हैं जो कभी पंढरपुर नहीं गए, क्योंकि उनका मानना था कि कर्तव्य-पालन ही साक्षात् तीर्थ है।

लहसुन-प्याज में परमात्मा का दर्शन

रूढ़िवादी कर्मकांड में जिन सब्जियों को त्याज्य माना जाता था, सावता जी ने निडर होकर उन्हें 'मेरी माता विठ्ठल' और 'श्रीहरि' का स्वरूप घोषित किया।

संत ज्ञानेश्वर और नामदेव का आगमन

जब ज्ञानेश्वर और नामदेव जैसे महान संत स्वयं अरण गाँव पहुँचे, तो उन्होंने सिद्ध कर दिया कि श्रम और भक्ति में कोई भेद नहीं है।

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