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Embroidered artwork for धरिला पंढरीचा चोर — संत जनाबाई अभंग: Embroidered Om symbol above a brass diya, marigolds and a temple spire at sunrise

धरिला पंढरीचा चोर — संत जनाबाई अभंग

धरिला पंढरीचा चोर — संत जनाबाई अभंग

वारकरी भक्ति आंदोलन की महान संत-कवयित्री संत जनाबाई का यह अत्यंत अद्भुत और ओजस्वी अभंग है। इसमें जनाबाई ने चित्तचोर भगवान विट्ठल को 'पंढरपुर का चोर' कहकर भक्ति और प्रेम की रस्सी से बाँध लिया है। उन्होंने विट्ठल को अपने हृदय रूपी कारागार में कैद कर लिया है और प्रभु से कहती हैं कि अब प्राण भले ही चले जाएं, मैं तुम्हें कभी मुक्त नहीं करूँगी।

श्लोक

धरिला पंढरीचा चोर गळां बांधोनियां दोर
Dharilā pandharīchā chora, galā bāndhoniyā dora

श्लोक 1

हृदयबंदीं केला खाणा आंत कोंडिला जाणा
Hrudaya bandī kelā khānā, ānta kondilā jānā

श्लोक 2

शब्दें केली जाचाजाची विठ्ठल केली चोरी साची
Shabdē kelī jāchājāchī, vitthala kelī chorī sāchī

श्लोक 3

जनी म्हणे बा विठ्ठला जीवें न सोडीं मी तुजला
Janī mhane bā vitthalā, jīve na sodī mī tujalā

श्लोक 4

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

शुभ दिन व तिथि

नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर

उत्तम मुहूर्त / समय

ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल

पूजन सामग्री व अर्पण

शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ
  • मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार

पृष्ठभूमि

संत जनाबाई (1258–1350) वारकरी संप्रदाय की अत्यंत सम्मानित संत थीं, जो संत नामदेव के परिवार में एक साधारण दासी के रूप में सेवा करती थीं। दासी होते हुए भी उनकी भक्ति इतनी प्रगाढ़ थी कि स्वयं भगवान विट्ठल उनके साथ चक्की पीसने और पानी भरने आते थे। 'धरिला पंढरीचा चोर' उनके अगाध प्रेम और ईश्वर पर पूर्ण अधिकार को दर्शाता है, जहाँ भक्त और भगवान के बीच कोई पर्दा या दूरी नहीं रह जाती।

इस पाठ के विषय में

रचयिता: Sant Janabai

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क्या आप जानते हैं?

चित्तचोर बने पंढरी के चोर

संत जनाबाई ने ईश्वर को 'चोर' कहकर अलौकिक प्रेम प्रकट किया है—जो प्रभु सबका अहंकार चुराते हैं, वे स्वयं भक्त के प्रेमपाश में बंधकर बंदी बन जाते हैं।

दासी का आत्मिक स्वाभिमान

मध्यकालीन सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ते हुए एक साधारण दासी द्वारा ईश्वर पर ऐसा पूर्ण अधिकार जताना भारतीय संत साहित्य का अद्वितीय गौरव है।

हृदय की बंदिशाला

अपने हृदय को 'कारागार' और प्रेम को 'रस्सी' बनाकर साक्षात् भगवान को कैद करने का यह रूपक मराठी साहित्य का अमर अलंकार है।

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