आमची केली हीन याती — संत कर्ममेळा अभंग
संत चोखामेळा के सुपुत्र संत कर्ममेळा (14वीं शताब्दी) का यह अभंग भारतीय भक्ति साहित्य में सामाजिक न्याय और आत्मसम्मान का अत्यंत साहसी और ऐतिहासिक दस्तावेज है। तत्कालीन जातिगत भेदभाव और छुआछूत के कारण समाज द्वारा बहिष्कृत किए जाने और जूठन खाने की विवशता पर कर्ममेळा सीधे भगवान विठ्ठल से प्रश्न करते हैं। 'हे लक्ष्मीपति, क्या आपको हमारी यह हीन दशा नहीं दिखती? हमारे घर में प्रेमपूर्वक दही-चावल खाने वाले आप अब कैसे मुंह फेर सकते हैं?' यह अभंग सिद्ध करता है कि सच्ची भक्ति में ईश्वर और भक्त के बीच कोई कृत्रिम सामाजिक दीवार नहीं हो सकती।
श्लोक
आपने हमें समाज में हीन और अछूत मानी जाने वाली जाति में जन्म दिया; हे लक्ष्मीपति श्रीविठ्ठल, क्या आपको हमारी यह मूक पीड़ा दिखाई नहीं देती?
श्लोक 1
हमारा पूरा जीवन दूसरों का छोड़ा हुआ जूठन खाते-खाते बीत गया; क्या हमारी इस दारुण दशा को देखकर आपके हृदय में लज्जा नहीं आती?
श्लोक 2
किन्तु हमारी इसी टूटी झोपड़ी में आकर आपने बड़े प्रेम से दही और भात खाया था; हमारा अन्न खाकर अब आप हमसे अनजान कैसे बन सकते हैं?
श्लोक 3
चोखामेळा के पुत्र कर्ममेळा कहते हैं: यदि हमें केवल यही अपमान और तिरस्कार सहना था, तो हे प्रभु, आपने मुझे यह मानव जन्म ही क्यों दिया?
श्लोक 4
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
वारकरी संप्रदाय की सबसे बड़ी महिमा यह है कि इसने 14वीं शताब्दी में ही जाति, कुल और वर्ण के समस्त भेदों को मिटाकर शोषित वर्ग को संत पद पर प्रतिष्ठित किया। संत चोखामेळा, उनकी पत्नी सोयराबाई और पुत्र कर्ममेळा का संपूर्ण परिवार विठ्ठल भक्ति में लीन था। जहां चोखामेळा जी का भाव अत्यंत सौम्य और सहनशील था, वहीं उनके पुत्र कर्ममेळा ने सामाजिक अपमान को सहने के बजाय सीधे भगवान विठ्ठल से न्याय मांगा। यह अभंग सिद्ध करता है कि ईश्वर के सम्मुख भक्त को अपनी पीड़ा और रोष व्यक्त करने का भी पूर्ण अधिकार है।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Sant Karmamela
क्या आप जानते हैं?
सामाजिक न्याय का स्वर
कर्ममेळा 14वीं शताब्दी के संत थे, और यह अभंग मराठी भक्ति-काव्य में जाति-भेद के विरुद्ध सबसे सीधे स्वरों में गिना जाता है। इसकी शक्ति स्वयं विठ्ठल से कही गई सरल, प्रेमपूर्ण शिकायत में है।
भगवान का दही-भात प्रेम
'हमारे घर में दही-भात खाकर अब कैसे मना करते हो'—यह पंक्ति उस प्रसिद्ध जनश्रुति को दर्शाती है जहां विठ्ठल ने चोखामेळा की झोपड़ी में बैठकर बड़े चाव से सादा भोजन ग्रहण किया था।
सकल संत गाथा में प्रतिष्ठा
चोखामेळा, सोयराबाई और कर्ममेळा पूरे परिवार के रूप में वारकरी संप्रदाय की आधिकारिक गाथा में पूज्य संतों के रूप में प्रतिष्ठित हैं।
Vitthal
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