ऊस डोंगा परी रस नोहे डोंगा — संत चोखामेळा अभंग
संत चोखामेला जी का यह कालजयी अभंग भारतीय भक्ति आंदोलन में सामाजिक समता और आत्मिक पवित्रता का अमर उद्घोष है। गन्ना टेढ़ा-मेढ़ा हो सकता है परंतु उसका रस मीठा ही रहता है; धनुष टेढ़ा होता है किंतु उसका तीर सीधा जाता है; नदी घुमावदार होती है परंतु उसका जल निर्मल रहता है—उसी प्रकार देह या सामाजिक जन्म जैसा भी हो, अंतरात्मा का भक्ति-रस सदैव निष्पाप और दिव्य होता है।
श्लोक
गन्ना भले ही टेढ़ा-मेढ़ा हो परंतु उसका रस कभी टेढ़ा नहीं होता; फिर हे मनुष्य, तुम केवल ऊपरी रंग और बाह्य रूप को देखकर क्यों भ्रमित होते हो?
श्लोक 1
धनुष की कमान भले ही झुकी और टेढ़ी हो परंतु उससे निकलने वाला तीर सीधा अचूक लक्ष्य पर जाता है; फिर ऊपरी रूप को देखकर क्यों भ्रमित होते हो?
श्लोक 2
नदी का प्रवाह चाहे कितना भी घुमावदार हो परंतु उसका जीवनदायी जल कभी टेढ़ा नहीं होता, वह सदा पावन और प्यास बुझाने वाला होता है; फिर बाह्य रंग देखकर क्यों भ्रमित होते हो?
श्लोक 3
चोखामेला का शरीर या सांसारिक जन्म भले ही समाज की दृष्टि में हीन या टेढ़ा हो, परंतु उनका ईश्वर के प्रति भाव और प्रेम-रस तनिक भी टेढ़ा नहीं है; फिर हे मनुष्य, तुम केवल ऊपरी जात-पात और रंग-रूप को देखकर क्यों भ्रमित होते हो?
श्लोक 4
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
संत चोखामेला (14वीं शताब्दी) वारकरी आंदोलन के अत्यंत पूज्य संत-कवि थे। तत्कालीन समाज द्वारा अस्पृश्य समझी जाने वाली महार जाति में जन्म लेने के कारण उन्हें मंदिर के भीतर जाने से रोका गया, परंतु भगवान विट्ठल स्वयं उनके प्रेम के वशीभूत होकर उनके साथ भोजन करते थे। जब मंगळवेढा में एक दीवार गिरने से उनकी मृत्यु हुई, तो संत नामदेव ने उनकी अस्थियों को पहचाना क्योंकि प्रत्येक अस्थि से 'विट्ठल विट्ठल' की ध्वनि निकल रही थी। उनकी समाधि आज भी पंढरपुर मंदिर के महाद्वार की पहली पायरी पर स्थित है।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Sant Chokhamela
क्या आप जानते हैं?
गुंजती हुई अस्थियाँ
जब चोखामेला जी की दीवार के नीचे दबने से मृत्यु हुई, तब संत नामदेव जी ने उनकी अस्थियों को इस चमत्कार से पहचाना कि प्रत्येक हड्डी से 'विट्ठल विट्ठल' का स्वर गूँज रहा था।
मंदिर की पायरी पर समाधि
आज भी पंढरपुर विट्ठल मंदिर में प्रवेश करने से पूर्व भक्तगण परंपरानुसार महाद्वार की पहली पायरी पर संत चोखामेला की समाधि को नमन करते हैं।
गन्ने का दृष्टांत
'ऊस डोंगा परी रस नोहे डोंगा' मराठी भाषा का अत्यंत लोकप्रिय मुहावरा बन चुका है, जो यह सिखाता है कि बाहरी रूप नहीं, अंतरात्मा का गुण ही सर्वोपरि है।
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