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Embroidered artwork for ऊस डोंगा परी रस नोहे डोंगा — संत चोखामेळा अभंग: Embroidered Om symbol above a brass diya, marigolds and a temple spire at sunrise

ऊस डोंगा परी रस नोहे डोंगा — संत चोखामेळा अभंग

ऊस डोंगा परी रस नोहे डोंगा — संत चोखामेळा अभंग

संत चोखामेला जी का यह कालजयी अभंग भारतीय भक्ति आंदोलन में सामाजिक समता और आत्मिक पवित्रता का अमर उद्घोष है। गन्ना टेढ़ा-मेढ़ा हो सकता है परंतु उसका रस मीठा ही रहता है; धनुष टेढ़ा होता है किंतु उसका तीर सीधा जाता है; नदी घुमावदार होती है परंतु उसका जल निर्मल रहता है—उसी प्रकार देह या सामाजिक जन्म जैसा भी हो, अंतरात्मा का भक्ति-रस सदैव निष्पाप और दिव्य होता है।

श्लोक

ऊस डोंगा परी रस नोहे डोंगा काय भुललासी वरलीया रंगा
Oos donga pari rasa nohe donga, kaya bhulalasi varaliya ranga

श्लोक 1

कमान डोंगी परी तीर नोहे डोंगा काय भुललासी वरलीया रंगा
Kamana dongi pari teera nohe donga, kaya bhulalasi varaliya ranga

श्लोक 2

नदी डोंगी परी पाणी नोहे डोंगें काय भुललासी वरलीया रंगा
Nadi dongi pari paani nohe donge, kaya bhulalasi varaliya ranga

श्लोक 3

चोखा डोंगा परी भाव नोहे डोंगा काय भुललासी वरलीया रंगा
Chokha donga pari bhava nohe donga, kaya bhulalasi varaliya ranga

श्लोक 4

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

शुभ दिन व तिथि

नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर

उत्तम मुहूर्त / समय

ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल

पूजन सामग्री व अर्पण

शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ
  • मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार

पृष्ठभूमि

संत चोखामेला (14वीं शताब्दी) वारकरी आंदोलन के अत्यंत पूज्य संत-कवि थे। तत्कालीन समाज द्वारा अस्पृश्य समझी जाने वाली महार जाति में जन्म लेने के कारण उन्हें मंदिर के भीतर जाने से रोका गया, परंतु भगवान विट्ठल स्वयं उनके प्रेम के वशीभूत होकर उनके साथ भोजन करते थे। जब मंगळवेढा में एक दीवार गिरने से उनकी मृत्यु हुई, तो संत नामदेव ने उनकी अस्थियों को पहचाना क्योंकि प्रत्येक अस्थि से 'विट्ठल विट्ठल' की ध्वनि निकल रही थी। उनकी समाधि आज भी पंढरपुर मंदिर के महाद्वार की पहली पायरी पर स्थित है।

इस पाठ के विषय में

रचयिता: Sant Chokhamela

क्या आप जानते हैं?

गुंजती हुई अस्थियाँ

जब चोखामेला जी की दीवार के नीचे दबने से मृत्यु हुई, तब संत नामदेव जी ने उनकी अस्थियों को इस चमत्कार से पहचाना कि प्रत्येक हड्डी से 'विट्ठल विट्ठल' का स्वर गूँज रहा था।

मंदिर की पायरी पर समाधि

आज भी पंढरपुर विट्ठल मंदिर में प्रवेश करने से पूर्व भक्तगण परंपरानुसार महाद्वार की पहली पायरी पर संत चोखामेला की समाधि को नमन करते हैं।

गन्ने का दृष्टांत

'ऊस डोंगा परी रस नोहे डोंगा' मराठी भाषा का अत्यंत लोकप्रिय मुहावरा बन चुका है, जो यह सिखाता है कि बाहरी रूप नहीं, अंतरात्मा का गुण ही सर्वोपरि है।

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