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Embroidered artwork for अवघा रंग एकचि झाला — संत सोयराबाई अभंग: Embroidered Om symbol above a brass diya, marigolds and a temple spire at sunrise

अवघा रंग एकचि झाला — संत सोयराबाई अभंग

अवघा रंग एकचि झाला — संत सोयराबाई अभंग

संत सोयराबाई (संत चोखामेला की सहधर्मिणी) का यह अमर अभंग अद्वैत भक्ति और सामाजिक समता का सर्वोच्च शिखर है। पंढरपुर के भगवान विट्ठल के साक्षात्कार से 'मैं और तू' का भेद मिट गया है; समस्त सांसारिक रंग और जातिगत सीमाएं समाप्त होकर केवल एक ही दिव्य रंग—श्रीरंग विट्ठल में एकाकार हो गई हैं।

श्लोक

अवघा रंग एकचि झाला रंगात श्रीरंग गुंतला
Avagha ranga ekachi jhala, rangata shriranga guntala

श्लोक 1

मी तूंपण गेले वाया पाहतां पंढरीच्या राया
Mee toompana gele vaaya, pahatam pandharichya raaya

श्लोक 2

नाही भेद नाही भाव अवघा झाला एक देव
Naahi bheda naahi bhaava, avagha jhaala eka deva

श्लोक 3

सोयरा म्हणे चोखोबासी देव अवघा झाला आम्हासी
Soyara mhane chokhobaasi, deva avagha jhaala aamhaasi

श्लोक 4

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

शुभ दिन व तिथि

नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर

उत्तम मुहूर्त / समय

ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल

पूजन सामग्री व अर्पण

शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ
  • मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार

पृष्ठभूमि

संत सोयराबाई (14वीं सदी) को वारकरी परंपरा में परंपरागत रूप से संत चोखामेला की पत्नी माना जाता है — इस संत-परिवार में उनके पुत्र कर्ममेला, चोखामेला की बहन निर्मला और बहनोई बंका भी शामिल हैं। भक्ति-समाज में यह प्रिय अभंग सोयराबाई की रचना के रूप में गाया जाता है, और इस पाठ की अंतिम पंक्ति में उनका नाम भी आता है। परंतु स्वतंत्र जाँच में यह कर्तृत्व प्रमाणित नहीं हो सका: यह अभंग न तो साखरे की मुद्रित 'श्री संत गाथा' में मिलता है, न ही 'संत चोखामेळा अभंगगाथा' (सप्तर्षि प्रकाशन, मंगळवेढा, 2014) में, न ही उपलब्ध संत तुकाराम गाथा में — इनमें से किसी में भी सोयराबाई का कोई स्वतंत्र खंड या 'अवघा रंग एकचि झाला' यह पंक्ति नहीं है। एक प्रमुख मराठी प्रकाशन (लोकसत्ता, 2015) में यही पंक्ति स्वयं चोखामेला के नाम पर दर्ज है। यह भजन गानसरस्वती किशोरी आमोणकर की प्रस्तुति से अत्यंत लोकप्रिय हुआ, परंतु इसका लिखित स्रोत अपुष्ट है; विशेषतः पद 1 और 4 किसी भी प्रामाणिक मुद्रित प्रति से मिलाए नहीं जा सके। यहाँ इसे सोयराबाई के नाम से जुड़ी जीवंत मौखिक/भक्ति-परंपरा के रूप में प्रस्तुत किया गया है, न कि प्रमाणित मूल पाठ के रूप में।

इस पाठ के विषय में

रचयिता: Sant Soyarabai

क्या आप जानते हैं?

अद्वैत भक्ति का अमर गान

शुष्क दार्शनिक अद्वैत के विपरीत, सोयराबाई ने अद्वैत को प्रेम के परम साक्षात्कार के रूप में जिया, जहाँ सांसारिक भेद मिटकर सब कुछ श्रीरंग विट्ठल में विलीन हो जाता है।

क्रांतिकारी संत कवयित्री

संत सोयराबाई ने 14वीं शताब्दी में यह सिद्ध किया कि वारकरी संप्रदाय में ईश्वर का साक्षात्कार समाज के सबसे उपेक्षित वर्गों और महिलाओं के लिए भी सहज सुलभ है।

संगीतमय धरोहर

किशोरी आमोणकर की प्रस्तुति के माध्यम से यह अभंग संगीत-सभाओं में महाराष्ट्र के बाहर भी व्यापक रूप से जाना जाता है।

अभिज्ञान-सूचना

यह प्रिय अभंग सोयराबाई के नाम से गाया जाता है, परंतु यह साखरे की मुद्रित 'श्री संत गाथा', 2014 की समर्पित 'संत चोखामेळा अभंगगाथा', अथवा उपलब्ध संत तुकाराम गाथा में नहीं मिला; एक प्रमुख मराठी प्रकाशन (लोकसत्ता, 2015) इसे चोखामेला के नाम दर्ज करता है। इसे यहाँ जीवंत भक्ति-परंपरा के रूप में सुरक्षित रखा गया है, परंतु इसका लिखित स्रोत अपुष्ट है।

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