अद्वैत भक्ति
संत एकनाथ का ‘काया ही पंढरी’: देह स्वयं पंढरपुर है, अंतर्यामी आत्मा विट्ठल है, और भक्ति भीमा नदी के रूप में बहती है।
संत सोयराबाई (संत चोखामेला की सहधर्मिणी) का यह अमर अभंग अद्वैत भक्ति और सामाजिक समता का सर्वोच्च शिखर है। पंढरपुर के भगवान विट्ठल के साक्षात्कार से 'मैं और तू' का भेद मिट गया है; समस्त सांसारिक रंग और जातिगत सीमाएं समाप्त होकर केवल एक ही दिव्य रंग—श्रीरंग विट्ठल में एकाकार हो गई हैं।
संत तुकाराम का अद्वैत आनंद का अभंग: आनंद के सरोवर में हर लहर आनंद ही है, और इस अनुभव के आगे शब्द मौन हो जाते हैं।