वृक्षावल्ली आम्हा सोयरे — संत तुकाराम अभंग
संत तुकाराम का यह प्रसिद्ध मराठी अभंग प्रकृति और ईश्वर की एकता का संदेश देता है। तुकाराम महाराज कहते हैं कि पेड़, पौधे और वन के पक्षी ही हमारे सच्चे सगे-संबंधी हैं, जो हमें शांत मन से श्री विट्ठल का ध्यान करने की प्रेरणा देते हैं।
श्लोक
वृक्ष, लताएँ और वन के जीव ही हमारे सच्चे बंधु-बांधव हैं, और पक्षी मधुर स्वर में हरि-गुण गाते हैं। इस सुखद वातावरण में एकांत वास मन को भाता है, जहाँ संसार के गुण-दोष स्पर्श भी नहीं कर पाते।
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
संत तुकाराम (1608–1650) महाराष्ट्र के वारकरी संप्रदाय के महान संत-कवि थे। श्री विट्ठल (विठोबा) के अनन्य भक्त तुकाराम ने जनभाषा मराठी में हजारों अभंगों की रचना की। यह अभंग देहू और भामचंद्र की पहाड़ियों में उनके द्वारा किए गए एकांत चिंतन और प्राकृतिक शांति को दर्शाता है।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Sant Tukaram · मध्यकालीन वारकरी संत · 17वीं शताब्दी, महाराष्ट्र
महाराष्ट्र के देहू ग्राम के वारकरी परंपरा के एक गृहस्थ-संत, जिन्होंने विठ्ठल की स्तुति में सरल, सीधी मराठी भाषा में हजारों अभंग (भक्ति पद) रचे, जिनमें प्रायः एक अनाज-व्यापारी के रूप में उनकी अपनी कठिनाइयों, शंकाओं एवं दैनिक संघर्षों का चित्रण मिलता है।
क्या आप जानते हैं?
वारकरी परंपरा
हर वर्ष पंढरपूर वारी यात्रा में 15 लाख से अधिक भक्त सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलते हैं, संत तुकाराम के अभंग गाते हुए।
इको-आध्यात्मिकता
तुकाराम की कविता को व्यापक रूप से भारत की प्रारंभिक आध्यात्मिक कविताओं में से एक माना जाता है जो पर्यावरणीय सामंजस्य और प्रकृति के प्रति गहरी श्रद्धा पर आधारित है।
अमर भक्ति
किंवदंती है कि जब विरोधियों ने तुकाराम की पांडुलिपियों को इंद्रायणी नदी में डुबोया, तो भगवान विट्ठल की कृपा से पवित्र ग्रंथ बिना किसी नुकसान के वापस तैर आए।
Vitthal
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