निर्गुणाचे भेटी आलो सगुणासंगे — संत गोरा कुंभार अभंग
13वीं शताब्दी के कुंभकार संत गोरा कुंभार का यह अमर आत्मसाक्षात्कार अभंग है। मिट्टी गूँथते और चाक पर बर्तन गढ़ते हुए उन्हें परब्रह्म का साक्षात्कार हुआ। निर्गुण-निराकार परमात्मा सगुण विट्ठल के रूप में प्रकट हुए और गोरा कुंभार का देहाभिमान मिटकर वे साक्षात् विट्ठलस्वरूप हो गए।
श्लोक
निर्गुण परमात्मा से मिलने जब मैं सगुण साकार विट्ठल के संग आया, तब मेरा सम्पूर्ण अस्तित्व उस परमात्मा के दिव्य स्वरूप में एकाकार हो गया।
श्लोक 1
मेरा झूठा देहाभिमान समाप्त हो गया और मुझे अपने आत्मस्वरूप का बोध हुआ; अब सर्वत्र सभी घटों (प्राणियों) में केवल पांडुरंग ही विराजमान दिखाई देते हैं।
श्लोक 2
चाक पर मिट्टी का घड़ा गढ़ते हुए मुझे यह सत्य स्मरण हो आया कि स्वयं भगवान ने इस संपूर्ण संसार को पंचतत्व रूपी मिट्टी का खेल ही तो बनाया है।
श्लोक 3
गोरा कुंभार कहते हैं कि मुझे साक्षात् विट्ठल मिल गए हैं; अब इस भवसागर और संसार के सारे बंधन हमेशा के लिए कट चुके हैं।
श्लोक 4
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
संत गोरा कुंभार (गोरबा) संत ज्ञानेश्वर और संत नामदेव के समकालीन वरिष्ठ वारकरी संत थे। संतों की सभा में संतों की आध्यात्मिक परिपक्वता की परीक्षा के लिए गोरा कुंभार को थापी से संतों के सिर की थाप लेने को कहा गया था, जिससे यह जाना गया कि कौन घड़ा 'कच्चा' है और कौन 'पक्का'। यह अभंग दर्शाता है कि कैसे एक साधारण कुम्हार अपने कर्म को ही ईश्वर की पूजा बनाकर जीवनमुक्त हो गया।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Sant Gora Kumbhar
क्या आप जानते हैं?
संतों की परीक्षा
आलंदी में संतों की सभा में गोरा कुंभार ने अपनी थापी से सभी संतों के सिर पर थाप देकर उनकी आध्यात्मिक परिपक्वता (कच्चे-पक्के की पहचान) की थी।
सगुण में निर्गुण का साक्षात्कार
यह रचना सिद्ध करती है कि साकार विट्ठल और निराकार परब्रह्म में कोई भेद नहीं है; मिट्टी का घड़ा और मिट्टी एक ही तत्व हैं।
श्रम की दिव्यता
गोरा कुंभार ने यह अमर संदेश दिया कि अपनी आजीविका का साधारण कार्य ही ईश्वर की सच्ची पूजा बन जाता है।
Vitthal
हिन्दू धर्म से और
सभी देखेंसंबंधित शिक्षाएं
एक ही शिक्षा, विभिन्न परंपराओं में प्रतिध्वनित
