संत गोरा कुंभार का अभंग: निर्गुण निराकार परब्रह्म सगुण रूप में भगवान से मिलता है, देह-भाव विलीन हो जाता है, और विट्ठल सर्वत्र व्याप्त हो जाते हैं।