जातां पंढरीसी सुख वाटे जीवा — संत सेना महाराज अभंग
संत सेना महाराज (14वीं शताब्दी) का यह अमर अभंग पंढरपुर की पावन पैदल वारी यात्रा का प्राणभूत गान है। संसार के समस्त ताप और संतापों को त्यागकर जैसे ही भक्त पंढरपुर के मार्ग पर आगे बढ़ता है, उसे जिस अलौकिक सुख की अनुभूति होती है, उसकी समता तीनों लोकों के किसी भी तीर्थ में नहीं है। लाखों संतों का गगनभेदी हरिनाम घोष, लहराती भगवा पताकाएं, पवित्र चंद्रभागा नदी, भक्त पुंडलिक और ईंट पर हाथ कमर पर रखे खड़े भगवान विठ्ठल—सेना जी कहते हैं कि जीवात्मा को इससे बढ़कर परम विश्रांति और आनंद संसार में कहीं प्राप्त नहीं हो सकता!
श्लोक
पंढरपुर के मार्ग पर चलते ही अंतरात्मा को असीम सुख प्राप्त होता है; और आनंदपूर्वक केशव से भेंट होते ही सारा जीवन धन्य हो जाता है!
श्लोक 1
इस दिव्य सुख की समता तीनों लोकों में किसी से नहीं की जा सकती; मैंने संसार के समस्त तीर्थों को खोज-खोज कर देख लिया है!
श्लोक 2
दिखाइए मुझे संसार में अन्यत्र कहीं ऐसा गगनचुंबी हरिनाम का घोष, ऐसे लहराते भगवा ध्वजों के समूह, और ऐसे देह-भाव से मुक्त मस्त वैष्णव भक्त?
श्लोक 3
दिखाइए मुझे कहीं ऐसी पापनाशिनी चंद्रभागा नदी, ऐसा माता-पिता का परमभक्त पुंडलिक, और ऐसी मुरली की तान बजाने वाला मनोहर कान्हा?
श्लोक 4
ईंट पर अविचल खड़े होकर अपनी दोनों भुजाओं को कमर पर टिकाए खड़ा ऐसा कृपालु प्रभु संसार में और कहां देखने को मिलेगा? ऐसा परमानंद कहीं और संभव ही नहीं!
श्लोक 5
सेना महाराज कहते हैं: संतों ने मुझे यह परम भेद और गुप्त रहस्य बता दिया है—पंढरी के इस दिव्य सुख और विठ्ठल के चरणों के अतिरिक्त जीवात्मा को संसार में सच्ची विश्रांति कहीं नहीं मिल सकती!
श्लोक 6
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
संत सेना महाराज (14वीं शताब्दी) वारकरी आंदोलन के प्रमुख संत थे, जो पेशे से नाई थे। राजा के दरबार में सेवा करते हुए भी उनका मन सदा विठ्ठल के चरणों में लीन रहता था। कथा है कि एक बार सेना जी की समाधि अवस्था के दौरान स्वयं भगवान विठ्ठल ने उनका रूप धारण करके राजा की सेवा की थी और राजा को दर्पण में भगवान का चतुर्भुज रूप दिखाया था। यह प्रसंग स्वयं श्रीसंतगाथा के सेना न्हावी विभाग में अभंग १०८-१०९ के रूप में पद्यबद्ध है, तथा इसकी व्यापक परंपरा महीपति के भक्तविजय ग्रंथ (अनुवाद: 'Stories of Indian Saints') में सुरक्षित है। पंढरपुर की आषाढ़ी वारी पदयात्रा में जब लाखों वारकरी पैदल चलते हैं, तो नाना महाराज साखरे संपादित श्रीसंतगाथा के सेना न्हावी विभाग में अभंग क्रमांक ४९ (पृष्ठ १६३ पर, archive.org की प्रति से सत्यापित) के रूप में संकलित यह अभंग पदयात्रियों के पैरों में नई ऊर्जा और प्राण फूंक देता है।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Sant Sena Nhavi
Sant Sena Nhavi की अन्य रचनाएं
क्या आप जानते हैं?
वारी पदयात्रियों का महामंत्र
महाराष्ट्र में इस अभंग को वारकरी संप्रदाय की 'डिंडी' का प्राण माना जाता है। ताल और पखावज की थाप पर पदयात्री इसे गाते हुए मीलों की दूरी सहज तय कर लेते हैं।
भगवान द्वारा नाई का रूप धारण करना
कथा है कि जब सेना जी पूजा में लीन थे, तब राजा के क्रोध से अपने भक्त को बचाने के लिए साक्षात् भगवान विठ्ठल ने नाई का रूप लेकर राजा की हजामत की थी।
पंढरी के पांच स्तम्भ
इस अभंग में पंढरपुर के पांच आधारों का सुंदर वर्णन है—हरिनाम का घोष, भगवा पताका, निष्काम वैष्णव संत, पावन चंद्रभागा और पुंडलिक की ईंट पर खड़े विठ्ठल।
Vitthal
हिन्दू धर्म से और
सभी देखेंसंबंधित शिक्षाएं
एक ही शिक्षा, विभिन्न परंपराओं में प्रतिध्वनित
