आम्ही दैवाचे दैवाचे — संत सेना न्हावी अभंग
वारकरी परंपरा के संत सेना नाई (14वीं शताब्दी) का यह अतिप्रसिद्ध अभंग है। अपने नाई के व्यवसाय को ही उन्होंने आध्यात्मिक साधना का माध्यम बनाया। वे कहते हैं कि हम परम भाग्यशाली हैं जो केवल विट्ठल के दास हैं; हाथ में दर्पण लेकर वे आत्मस्वरूप का दर्शन कराते हैं और कैंची से अहंकार का मुंडन करते हैं।
श्लोक
हम सचमुच परम भाग्यशाली हैं, परम सौभाग्यशाली हैं; क्योंकि हम केवल और केवल भगवान विठोबा के अनन्य दास हैं।
श्लोक 1
हाथ में विवेक रूपी दर्पण लेकर, हम प्रत्येक मनुष्य को उसके मुख का वास्तविक आत्म-स्वरूप दिखाते हैं।
श्लोक 2
हमारी वैराग्य रूपी कैंची अपना कार्य करती है और मनुष्य के सिर पर उगे अहंकार और अभिमान को जड़ से कतर देती है।
श्लोक 3
संत सेना कहते हैं कि यद्यपि हम जाति और व्यवसाय से नाई हैं, किंतु परम प्रेम से सदा भगवान विट्ठल के चरण कमलों की वंदना करते हैं।
श्लोक 4
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
संत सेना नाई वारकरी संप्रदाय और उत्तर भारत के भक्तिकालीन संतों में आदरणीय हैं (श्री गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित भगत सैन की वाणी से परंपरा इनकी पहचान जोड़ती है)। किंवदंती है कि एक बार जब वे सुबह विट्ठल की पूजा में लीन थे, तब राजा के दूत उन्हें बुलाने आए। भक्त की पूजा में विघ्न न पड़े, इसलिए स्वयं भगवान विट्ठल ने सेना नाई का रूप धारण कर राजा की सेवा की। जब राजा ने दर्पण में चतुर्भुज रूप का दर्शन किया, तब सेना जी की अप्रतिम भक्ति की महिमा प्रकट हुई। यह प्रसंग स्वयं नाना महाराज साखरे द्वारा संपादित श्रीसंतगाथा के सेना न्हावी विभाग में अभंग १०८-१०९ के रूप में पद्यबद्ध मिलता है, तथा इस परंपरा का विस्तृत वर्णन महीपति के १८वीं शताब्दी के भक्तविजय ग्रंथ (अंग्रेज़ी अनुवाद: 'Stories of Indian Saints', अनुवादक जस्टिन ई. एबट एवं एन. आर. गोडबोले) में मिलता है। प्रामाणिकता-टिप्पणी: 'आम्ही दैवाचे दैवाचे' वारकरी परंपरा में लोकप्रिय रूप से सेना न्हावी को अर्पित माना जाता है, किंतु साखरे-संपादित श्रीसंतगाथा के सेना न्हावी विभाग में इसका प्रत्यक्ष पाठ नहीं मिल सका; अतः इसे इस विशिष्ट मुद्रित गाथा से सत्यापित रचना के बजाय परंपरागत/मौखिक रूप से अर्पित रचना मानना उचित है।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Sant Sena Nhavi
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क्या आप जानते हैं?
गुरु ग्रंथ साहिब में भगत सैन
श्री गुरु ग्रंथ साहिब (अंग 695) में भगत सैन का 'धूप दीप घृत' पद है; अनेक वृत्तांत उन्हें संत सेना नाई से जोड़ते हैं, यह पहचान परंपरागत है।
कर्म ही अध्यात्म
सेना जी ने नाई के औजारों को अध्यात्म के प्रतीकों में बदल दिया: दर्पण आत्म-निरीक्षण का और कैंची अहंकार की कटाई का।
भक्त के लिए भगवान बने नाई
जब सेना पूजा में मग्न थे, तब भगवान विट्ठल ने स्वयं नाई बनकर राजा की सेवा की थी, जो ईश्वर की भक्त-वत्सलता का अनुपम प्रमाण है।
Vitthal
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