विट्ठल-रुक्मिणी मंदिर
यह भजन संत तुकाराम द्वारा रचित है, जिसमें प्रकृति के बीच एकान्त में रहने के आनंद का वर्णन है। पेड़-पौधे, पक्षी और वन्य जीव साथी बन जाते हैं, और हरि कथा ही भोजन बन जाती है।
पंढरपुर के विट्ठल की संध्या आरती, जो परंपरा से संत नामदेव की मानी जाती है; ईंट पर खड़े विट्ठल और वामांग में रखुमाई का गुणगान।
विट्ठल को भोर में प्रेम से जगाने वाली काकड़ आरती, जिसमें 'तुका म्हणे' की छाप है और जो इसलिए संत तुकाराम की मानी जाती है; पंढरपुर और महाराष्ट्र में गाई जाती है।
संत बहिणाबाई के अभंग में वारकरी मंदिर का चित्र: ज्ञानदेव ने उसकी नींव रखी, नामदेव ने उसका विस्तार किया, एकनाथ ने उसका स्तंभ खड़ा किया और तुकाराम उसका स्वर्णिम कलश बने।
संत चोखामेळा का अभंग: गन्ना टेढ़ा होता है परंतु उसका रस सीधा रहता है, जैसे धनुष टेढ़ा होता है परंतु उससे छूटा बाण सीधा जाता है। जन्म कभी भक्ति के भाव को टेढ़ा नहीं करता।
वारकरी परंपरा की दैनिक उपासना: संत ज्ञानदेव के 28 अभंग, जो उपनिषदों के अद्वैत चिंतन को भगवान विट्ठल की भक्ति के साथ सामंजस्य में लाते हैं।
संत ज्ञानदेव का ‘मोगरा फुलला’: हृदय के द्वार पर रोपी गई चमेली आकाश तक चढ़ती है, और उसके पुष्प भगवान विट्ठल को अर्पित शाल में गूँथे जाते हैं।
संत ज्ञानदेव का ‘रूप पाहता लोचनी’: विट्ठल के रूप के दर्शन का आनंद, अनेक जन्मों के सुकृत का फल, और समस्त सुखों का आगार।
संत एकनाथ का ‘काया ही पंढरी’: देह स्वयं पंढरपुर है, अंतर्यामी आत्मा विट्ठल है, और भक्ति भीमा नदी के रूप में बहती है।
संत एकनाथ का ‘माझे माहेर पंढरी’: पंढरपुर एक विवाहित पुत्री का प्रिय मायका है, जहाँ विट्ठल और रखुमाई माता-पिता हैं और पुंडलीक भाई हैं।
संत एकनाथ का ‘विंचू चावला’: काम और क्रोध के बिच्छू-दंश पर रचा गया भारूड, जिसका उपचार सत्त्व की भस्म और गुरु के चरणों में समर्पण से होता है।
संत गोरा कुंभार का अभंग: निर्गुण निराकार परब्रह्म सगुण रूप में भगवान से मिलता है, देह-भाव विलीन हो जाता है, और विट्ठल सर्वत्र व्याप्त हो जाते हैं।
संत जनाबाई का अभंग: प्रेम की रस्सी से वे पंढरपुर के चोर को बाँध लेती हैं, विट्ठल को अपने हृदय के कारागार में बंद कर देती हैं और उन्हें कभी जाने नहीं देतीं।
संत कान्होपात्रा की पूर्ण समर्पण की प्रार्थना: वे विट्ठल से अब और परीक्षा न लेने की विनती करती हैं, उनके चरणों में शीश रखती हैं, और परंपरा स्मरण करती है कि वे उन्हीं में विलीन हो गईं।
संत चोखामेळा के सुपुत्र संत कर्ममेळा (14वीं शताब्दी) का यह अभंग भारतीय भक्ति साहित्य में सामाजिक न्याय और आत्मसम्मान का अत्यंत साहसी और ऐतिहासिक दस्तावेज है। तत्कालीन जातिगत भेदभाव और छुआछूत के कारण समाज द्वारा बहिष्कृत किए जाने और जूठन खाने की विवशता पर कर्ममेळा सीधे भगवान विठ्ठल से प्रश्न करते हैं। 'हे लक्ष्मीपति, क्या आपको हमारी यह हीन दशा नहीं दिखती? हमारे घर में प्रेमपूर्वक दही-चावल खाने वाले आप अब कैसे मुंह फेर सकते हैं?' यह अभंग सिद्ध करता है कि सच्ची भक्ति में ईश्वर और भक्त के बीच कोई कृत्रिम सामाजिक दीवार नहीं हो सकती।
संत नामदेव विट्ठल से कहते हैं कि उनका नाम अमृत से भी मधुर है, फिर भी मन उसका स्वाद नहीं लेता: कीर्तन आरंभ होते ही नींद और चंचलता घेर लेती हैं।
संत नामदेव का ‘नाचू कीर्तनाचे रंगी’: कीर्तन के आनंद में नृत्य करो, संसार में ज्ञान का दीप जलाओ, और केवल नाम ही सबका उद्धार करे।
संत नरहरी सोनार का यह सबसे प्रसिद्ध अभंग है, जिसमें वे अपने सुनार के व्यवसाय के रूपकों से शरीर को कर्मशाला, विवेक को हथौड़ा और भीतर परिष्कृत होते रामनाम को शुद्ध सोना बताते हैं।
संत जनाबाई की विट्ठल-माता से कोमल प्रार्थना: पंढरपुर की नदियों पर आओ और मेरे आँगन में नाचो, क्योंकि मेरा आनंद तुम्हारे गुणों में है।
संत सावता माली का अभंग: अपनी ही सब्ज़ी-वाटिका के प्याज़, लहसुन, मिर्च और कुएँ की रस्सी में विट्ठल का दर्शन। कर्म ही पूजा है।
संत सेना का तीर्थयात्रा-गीत: पंढरपुर की राह का आनंद, जिसके समान तीनों लोकों में कोई दूसरी तीर्थयात्रा नहीं।
वारकरी परंपरा के संत सेना नाई (14वीं शताब्दी) का यह अतिप्रसिद्ध अभंग है। अपने नाई के व्यवसाय को ही उन्होंने आध्यात्मिक साधना का माध्यम बनाया। वे कहते हैं कि हम परम भाग्यशाली हैं जो केवल विट्ठल के दास हैं; हाथ में दर्पण लेकर वे आत्मस्वरूप का दर्शन कराते हैं और कैंची से अहंकार का मुंडन करते हैं।
संत सोयराबाई (संत चोखामेला की सहधर्मिणी) का यह अमर अभंग अद्वैत भक्ति और सामाजिक समता का सर्वोच्च शिखर है। पंढरपुर के भगवान विट्ठल के साक्षात्कार से 'मैं और तू' का भेद मिट गया है; समस्त सांसारिक रंग और जातिगत सीमाएं समाप्त होकर केवल एक ही दिव्य रंग—श्रीरंग विट्ठल में एकाकार हो गई हैं।
संत तुकाराम का यह विदाई-अभंग है, जिसे परंपरा के अनुसार उनके वैकुंठ-प्रस्थान के समय गाया गया: अंतिम 'राम-राम' और जीवन के बंधनों से मुक्ति का उद्घोष।
संत तुकाराम का शरणागति में विश्राम देने वाला अभंग: विट्ठल के चरणों का दर्शन पाकर चंचल मन के लिए भटकने का कोई और ठिकाना नहीं रह जाता।
संत तुकाराम का अद्वैत आनंद का अभंग: आनंद के सरोवर में हर लहर आनंद ही है, और इस अनुभव के आगे शब्द मौन हो जाते हैं।
संत तुकाराम का विरह-भक्ति का अभंग: जैसे चकोर चंद्रमा के लिए और बालक माँ के लिए तरसता है, वैसे ही उनकी आत्मा विट्ठल के दर्शन की प्रतीक्षा करती है।
संत तुकाराम की विट्ठल से की गई संक्षिप्त प्रार्थना: वे एक ही वरदान माँगते हैं कि प्रभु का विस्मरण कभी न हो और संतों का संग मिले; मुक्ति या संपत्ति उनके लिए इससे बढ़कर नहीं।
संत तुकाराम का अभंग, जो सच्चे साधु की पहचान बताता है: जो दुःखी और पीड़ित जनों को अपना मानकर गले लगाता है, उसी में ईश्वर का वास है।
संत तुकाराम का आनंदमय अभंग, जिसमें चंद्रभागा के वाळवंट पर वैष्णव नाचते हैं और अहंकार त्यागकर एक-दूसरे के चरणों में प्रणाम करते हैं।
संत तुकाराम की लघुता की प्रार्थना: चींटी को शक्कर मिलती है जबकि विशाल ऐरावत अंकुश की मार सहता है, इसलिए विनम्रता ही श्रेष्ठ वरदान है।
संत तुकाराम का ध्यान-अभंग: ईंट पर कटि पर हाथ धरे खड़े, तुलसी-माला और पीतांबर धारी पंढरपुर के विट्ठल के सुंदर स्वरूप का भक्ति-पूर्ण वर्णन।
संत तुकाराम का नाम-संकीर्तन का अभंग: विट्ठल के गुण गाओ, उनका ध्यान करो और ईंट पर खड़े उन्हें देखो; उनके नाम से मुख मधुर हो जाता है।
तुकाराम गाथा का अभंग क्रमांक 2481: संत तुकाराम सृष्टि की एकता का उत्सव मनाते हैं; वृक्ष, वल्लरी और पक्षी जैसे आत्मीय जन आत्मा को विट्ठल के ध्यान की ओर ले जाते हैं।