मोगरा फुलला — संत ज्ञानेश्वर अभंग
संत ज्ञानेश्वर महाराज (13वीं शताब्दी) का यह अभंग भारतीय रहस्यवादी और विरहिणी काव्य का अनुपम शिखर है। हृदय के द्वार पर लगाया गया भक्ति का नन्हा सा पौधा गुरुकृपा और प्रेमानुभूति से आकाश तक फैल गया है। जैसे मोगरे (चमेली) के खिलने से संपूर्ण परिवेश सुगंधित हो उठता है, वैसे ही सहस्रार और आत्मज्ञान के प्रस्फुटन से उत्पन्न अनिर्वचनीय आनंद को ज्ञानेश्वर महाराज ने मन के सूक्ष्म तंतुओं से एक दिव्य दुपट्टा (शेला) बुनकर श्री विठ्ठल के चरणों में समर्पित कर दिया है।
श्लोक
मोगरा खिल गया है, चमेली का पुष्प खिल उठा है! जब मैंने खिले हुए फूलों को चुनना शुरू किया, तो कलियों में और भी अधिक प्रचुर बहार आ गई।
श्लोक 1
हृदय के द्वार पर एक नन्हा सा कोमल पौधा लगाया था; देखते ही देखते उसकी लता इतनी बढ़ गई कि वह गगन को छूने लगी!
श्लोक 2
मन की अंतरंग भावनाओं और सूक्ष्म तंतुओं से भक्ति का एक दिव्य दुपट्टा (शेला) गूंथकर, रखुमाई के स्वामी पिता विठ्ठल को समर्पित कर दिया है।
श्लोक 3
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
संत ज्ञानेश्वर (1275–1296) ने अपने भावपूर्ण अभंगों में अद्वैत वेदांत और सगुण भक्ति का अद्भुत समन्वय किया है। 'मोगरा फुलला' ज्ञानेश्वर महाराज की सर्वाधिक लोकप्रिय 'विरहिणी' रचना मानी जाती है। विरहिणी में जीवात्मा परमात्मा के विरह और मिलन की तड़प को व्यक्त करता है। यहां मोगरा कुंडलिनी शक्ति के सहस्रार चक्र में प्रस्फुटित होने और आत्मसाक्षात्कार का प्रतीक है। साधना के आरंभ में जो साधना नन्हीं सी लगती है, वह भगवत्कृपा से विराट होकर ब्रह्मलीन कर देती है।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Sant Dnyaneshwar · मध्यकालीन वारकरी संत · 13वीं शताब्दी, महाराष्ट्र
मराठी दार्शनिक-संत, जिनके विषय में परंपरा कहती है कि उन्होंने किशोरावस्था में ही भगवद्गीता पर प्रसिद्ध मराठी टीका ज्ञानेश्वरी रची। उन्हें महाराष्ट्र की वारकरी (विठ्ठल-भक्त) परंपरा का आधारभूत व्यक्तित्व माना जाता है, तथा उनका पसायदान आज भी समस्त प्राणियों के कल्याण हेतु एक सार्वभौमिक प्रार्थना के रूप में पढ़ा जाता है।
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क्या आप जानते हैं?
मोगरे का आध्यात्मिक रूपक
वारकरी संप्रदाय में मोगरे का फूल सहस्रार चक्र और आंतरिक चेतना के प्रस्फुटन का प्रतीक माना जाता है।
लता मंगेशकर का अमर गायन
भारत रत्न लता मंगेशकर और पंडित हृदयनाथ मंगेशकर के संगीत निर्देशन में इस अभंग की प्रस्तुति भारतीय संगीत के इतिहास में अमर हो चुकी है।
विरहिणी विधा
यह केवल बाह्य कीर्तन का पद नहीं, बल्कि अंतःकरण में भगवत्-मिलन की गहन तड़प और आत्मसाक्षात्कार का रहस्यवादी दर्शन है।
Vitthal
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