प्रकृति में भक्ति का आनंद
यह भजन संत तुकाराम द्वारा रचित है, जिसमें प्रकृति के बीच एकान्त में रहने के आनंद का वर्णन है। पेड़-पौधे, पक्षी और वन्य जीव साथी बन जाते हैं, और हरि कथा ही भोजन बन जाती है।
श्लोक
वृक्ष, बेलें हमारे संबंधी हैं; वनचर और पक्षी मधुर स्वर में पुकारते हैं।
श्लोक 1
इस सुख से एकांत का निवास रुचता है; गुण-दोष शरीर को नहीं लगते।
श्लोक 2
आकाश मंडप है, पृथ्वी आसन है; वहाँ मन रमता है और क्रीड़ा करता है।
श्लोक 3
कंथा और कमंडलु शरीर के उपचार के लिए हैं; वायु अवसर का बोध कराती है।
श्लोक 4
हरिकथा ही भोजन है, पत्तल विस्तार से बिछी है; विविध प्रकार से रुचिपूर्वक सेवन करें।
श्लोक 5
तुका कहते हैं, मन से संवाद होता है; अपना ही वाद अपने से है।
श्लोक 6
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
यह भजन महाराष्ट्र की वारकरी परंपरा का हिस्सा है, जिसे 17वीं शताब्दी के संत तुकाराम ने रचा। वारकरी संतों की यह परंपरा भगवान विट्ठल की भक्ति और सादगीपूर्ण जीवन पर बल देती है। इस भजन को अक्सर एकांत में ध्यान या भक्ति सभाओं में गाया जाता है। यह अभंग तुकाराम गाथा में संकलित है और पंढरपुर के विट्ठल के वारकरी भक्त इसे गाते हैं।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Sant Tukaram · मध्यकालीन वारकरी संत · 17वीं शताब्दी, महाराष्ट्र
महाराष्ट्र के देहू ग्राम के वारकरी परंपरा के एक गृहस्थ-संत, जिन्होंने विठ्ठल की स्तुति में सरल, सीधी मराठी भाषा में हजारों अभंग (भक्ति पद) रचे, जिनमें प्रायः एक अनाज-व्यापारी के रूप में उनकी अपनी कठिनाइयों, शंकाओं एवं दैनिक संघर्षों का चित्रण मिलता है।
क्या आप जानते हैं?
रचनाकार
ये अभंग महाराष्ट्र के १७वीं सदी के संत-कवि तुकारामजी द्वारा रचित हैं। वे वारकरी परंपरा के प्रमुख कवि थे, जिनकी रचनाओं में भक्ति और सादगी का अद्भुत समावेश है।
प्रकृति का मंदिर
तुकारामजी ने वृक्षों, बेलों और पक्षियों को अपना परिवार बताया है। पक्षियों के मधुर स्वर को ईश्वर का आह्वान माना गया है, जो इस पद्य में वैराग्य और एकांत की महिमा को रेखांकित करता है।
एकांत का सुख
दूसरे पद्य में कहा गया है कि इस प्राकृतिक आनंद में रहने पर शरीर को गुण-दोष का कोई भान नहीं रहता। यह संसार के मोह-बंधनों से मुक्ति का सूचक है।
सादगी का संदेश
तीसरे पद्य में आकाश को मंडप और पृथ्वी को आसन बताकर ईश्वर से जुड़े मन के क्रीड़ा करने का वर्णन है। यह बाहरी आडंबरों से परे, अंतर्मन में ईश्वर को खोजने का संदेश देता है।
साधु का जीवन
गुदड़ी (कंथा) और कमंडलु को देह की देखभाल का साधन बताया गया है। वायु (प्राकृतिक शक्ति) ही समय का बोध कराती है, यह साधु जीवन की सहज निर्भरता को दर्शाता है।
हरिकथा ही भोजन
पाँचवें पद्य में हरिकथा (भगवत्कथा) को भोजन और विस्तार के रूप में प्रस्तुत किया गया है। तुकारामजी कहते हैं कि इस भोजन को रुचि पूर्वक सेवन करना चाहिए, जो आध्यात्मिक पोषण का प्रतीक है।
तुकाराम की शैली
अंतिम पद्य में 'तुका ह्मणे' (तुका कहते हैं) के माध्यम से कवि स्वयं से संवाद करते हैं। यह आत्म-संवाद और आत्म-साक्षात्कार की उनकी अनूठी शैली को प्रकट करता है।
Vitthal
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