विंचू चावला — संत एकनाथ भारुड
संत एकनाथ (16वीं शताब्दी) का 'विंचू चावला' (बिच्छू ने काटा) मराठी साहित्य और लोक-भक्ति परंपरा का अत्यंत लोकप्रिय और नाटकीय आध्यात्मिक रूपक (भारुड) है। काम और क्रोध रूपी विषैला बिच्छू जब जीवात्मा को डसता है, तब काम-वासना और क्रोध की ज्वाला से समस्त शरीर जलने लगता है। इस आध्यात्मिक विष का एकमात्र अचूक निवारण 'तमोगुण को त्यागकर सत्त्वगुण का भस्म लगाना' और हरि-नाम का स्मरण करना है।
श्लोक
बिच्छू ने काट लिया, भयंकर बिच्छू ने काट लिया! काम और क्रोध रूपी विषैले बिच्छू ने मुझे डस लिया है; इस दुष्ट और घातक बिच्छू ने मेरी आत्मा को जकड़ लिया है!
श्लोक 1
उसका डंक लगते ही मेरा सारा शरीर पसीने से तर-बतर हो गया; मेरे अंगों में त्रिदोष (वात, पित्त, कफ तथा काम, क्रोध, मोह) का असह्य दाह और जलन उठने लगी!
श्लोक 2
इस भयंकर बिच्छू के विष का अचूक उतारा यह है: तमोगुण (अज्ञान, आलस्य, क्रोध) को पीछे धकेल दो, और सत्त्वगुण रूपी पवित्र भस्म (अंगारा) लगाओ; तब यह विषैला बिच्छू तुरंत उतर जाएगा!
श्लोक 3
सत्त्वगुण का दिव्य उतारा देते ही वह समस्त दुर्जन विकार शांत हो गया। गुरु जनार्दन स्वामी के चरणों में लीन होकर संत एकनाथ कहते हैं कि अब वह काम-क्रोध रूपी बिच्छू पूर्णतः विषहीन और शांत हो गया है!
श्लोक 4
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
संत एकनाथ ने समाज सुधार और जन-जागृति के लिए 'भारुड' (लोक-नाट्य शैली) का क्रांतिकारी प्रयोग किया। वेदान्त के कठिन दर्शन को जनसाधारण की भाषा में समझाने के लिए उन्होंने सामान्य लोक-प्रतीकों का उपयोग किया। 'विंचू चावला' उनके भारुडों में सर्वाधिक प्रसिद्ध है। इसमें मनुष्य के छह आंतरिक शत्रुओं (काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह, मत्सर) को शांत करने के लिए सत्त्वगुण की शक्ति का आह्वान किया गया है।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Sant Eknath
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क्या आप जानते हैं?
वेदांत का लोक-नाट्य
संत एकनाथ के भारुड वास्तव में संगीतबद्ध आध्यात्मिक एकांकी होते थे, जिनके माध्यम से वे अनपढ़ ग्रामीणों को भी वेदांत के गूढ़ सिद्धांत हँसते-खेलते सिखा देते थे।
त्रिगुणों का रूपक
बिच्छू के डंक से तमोगुण और रजोगुण का ज्वर चढ़ता है; उसका एकमात्र उपचार पवित्र गोमय भस्म (अंगारा) के रूप में सात्त्विक गुणों को धारण करना बताया गया है।
एका जनार्दनी की गुरु-छाप
एकनाथ जी अपनी प्रत्येक रचना में 'एका जनार्दनी' (गुरु जनार्दन स्वामी के चरणों में लीन एकनाथ) की छाप लगाते हैं, जो दर्शाता है कि गुरु-कृपा ही समस्त आध्यात्मिक विषों को निष्प्रभावी बनाती है।
Vitthal
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