श्री रामचंद्र जी की आरती
यह एक पारंपरिक भक्ति गीत (आरती) है जो भगवान राम की स्तुति में गाया जाता है। इसे मंदिरों और घरों में पूजा के अंत में दीपक लेकर घुमाते समय गाते हैं।
श्लोक
रामचन्द्र जी की आरती कीजिए, जो दुष्टों का नाश करने वाले हैं और सीता जी के पति हैं।
श्लोक 1
पहली आरती पुष्पों की माला से होती है, जिसे गोपाल श्रीकृष्ण कालिय नाग के पास से लाए थे।
श्लोक 2
दूसरी आरती देवकी नंदन श्रीकृष्ण की है, जो भक्तों का उद्धार करने वाले और कंस का नाश करने वाले हैं।
श्लोक 3
तीसरी आरती तीनों लोकों को मोहने वाली है। रत्नजड़ित सिंहासन पर सीता जी और राम जी शोभायमान हैं।
श्लोक 4
चौथी आरती चारों युगों में पूजी जाती है। भगवान निरंजन हैं, उनके समान कोई दूसरा नहीं है।
श्लोक 5
पाँचवीं आरती श्रीराम को प्रिय है। श्रीराम जी के यश को नामदेव जी गाते हैं।
श्लोक 6
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
यह आरती भगवान राम की स्तुति में गाई जाने वाली वैष्णव भक्ति की लोकप्रिय आरती है। इसे प्रायः संध्या आरती या रामनवमी जैसे विशेष अवसरों पर गाया जाता है। परंपरा इसे संत नामदेव से जोड़ती है, और अंतिम पद में उनका नाम आता है। इसका प्रत्येक पद एक आरती है। पहले पद में गोपाल द्वारा काली नाग को नाथने का उल्लेख है, जिसकी कथा भागवत पुराण (10.16) में है। दूसरे पद में देवकी नंदन कृष्ण द्वारा कंस के संहार का स्मरण है, जिसकी कथा भागवत पुराण 10.3 और 10.44 में है। तीसरे पद में रत्नसिंहासन पर विराजमान सीता-राम का, और चौथे पद में चारों युगों में पूजित निरंजन स्वामी का गान है। भगवान राम के जीवन-चरित्र, उनके शौर्य तथा सीता के उद्धार और राजतिलक की कथा वाल्मीकि रामायण में है, जो राम-भक्ति का मूल शास्त्रीय आधार (इतिहास) है।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Sant Namdev
क्या आप जानते हैं?
आरती का अर्थ
'आरती' संस्कृत के 'आरात्रिक' से बना है, जिसका अर्थ है अंधकार दूर करना। यह भक्ति में दीपक घुमाकर भगवान का स्वागत करने की प्राचीन परंपरा है, जो प्रेम और श्रद्धा का प्रतीक है।
रामचन्द्र जी की विशेषता
यह आरती भगवान राम को 'सीतापति' और 'दुष्टदलन' (दुष्टों का नाश करने वाले) कहती है। यह उनके मर्यादा पुरुषोत्तम स्वरूप और राक्षसों के संहारक रूप दोनों को एक साथ दर्शाती है।
पहली आरती का प्रतीक
पहली आरती में पुष्पों की माला और काली नाग का उल्लेख है। यह कृष्ण के बाल रूप की ओर संकेत करता है, जब उन्होंने कालिया नाग का दमन किया था। यहाँ राम और कृष्ण के अवतारों की एकता दिखाई गई है।
दूसरी आरती में कंस वध
देवकी नंदन और कंस का नाश करने वाले कृष्ण की महिमा गाई गई है। यह भक्तों की रक्षा और अत्याचारियों के अंत का संदेश देती है, जो भक्ति परंपरा का मूल है।
तीसरी आरती का वैभव
तीसरी आरती में रत्नों के सिंहासन पर विराजमान सीता-राम का वर्णन है। 'त्रिभुवन मोहे' का अर्थ है तीनों लोकों (स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल) को मोहित करने वाला, जो उनके दिव्य सौंदर्य और आकर्षण को दर्शाता है।
चौथी आरती का दर्शन
'चहुं युग पूजा' का अर्थ है सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग — चारों युगों में पूजनीय। 'देव निरंजन' का अर्थ है निराकार, निष्कलंक परमात्मा, और यह बताता है कि राम ही एकमात्र सर्वोच्च सत्य हैं।
पांचवीं आरती और संत परंपरा
अंतिम आरती में संत नामदेव जी का उल्लेख है, जो 13वीं सदी के महान भक्त कवि थे। उन्होंने राम के यश को अपने भजनों में गाया, जिससे यह आरती संत परंपरा से जुड़ी हुई है।
रचना और शैली
यह आरती सरल भाषा में रची गई है और हर पद एक आरती के रूप में क्रम से गाया जाता है। यह आमतौर पर रामनवमी जैसे अवसरों पर मंदिरों और घरों में गाई जाती है।
Rama
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