अद्वैताष्टकम् (गङ्गातीरे तत्पयोभिः)
यह आठ श्लोकों वाला एक भक्तिपूर्ण स्तोत्र है, जो श्रील अद्वैताचार्य की महिमा का वर्णन करता है। इसे प्रसिद्ध विद्वान और भक्त सार्वभौम भट्टाचार्य ने रचा था।
श्लोक
मैं गंगा के तट पर उसके जल, तुलसी के पत्तों, फूलों और प्रेम की गर्जना के साथ गौर (श्री चैतन्य) को प्रकट कराने के लिए आराधना करने वाले श्रील अद्वैताचार्य की शरण लेता हूँ।
श्लोक 1
जिनकी प्रेम के सागर के विकारस्वरूप गर्जनाओं से आकर्षित होकर गोलोकनाथ गौर श्री नवद्वीप में प्रकट हुए, उन श्रील अद्वैताचार्य की मैं शरण लेता हूँ।
श्लोक 2
जिन्होंने श्रील चैतन्यचंद्र को प्रकट कराकर ब्रह्मा आदि के लिए भी दुर्लभ प्रेम के प्रवाह से संसार को प्लावित कर दिया, उन श्रील अद्वैताचार्य की मैं शरण लेता हूँ।
श्लोक 3
सर्वशक्तिमान श्री चैतन्य भी जिनकी आज्ञा से इस संसार से अंतर्धान हो गए, और जिनकी कृपा का कार्य समझना कठिन है, उन श्रील अद्वैताचार्य की मैं शरण लेता हूँ।
श्लोक 4
जिनके अंश ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं जो ब्रह्मांड की सृष्टि, स्थिति और विनाश करते हैं तथा जो महाविष्णु से अभिन्न हैं, उन श्रील अद्वैताचार्य की मैं शरण लेता हूँ।
श्लोक 5
जिन्हें कुछ शास्त्रों में शंभु (शिव) का आश्रय माना गया है, इसलिए जिनका नाम और धाम प्रसिद्ध है, जो सभी के द्वारा आराध्य हैं और केवल भक्ति द्वारा ही प्राप्य हैं, उन श्रील अद्वैताचार्य की मैं शरण लेता हूँ।
श्लोक 6
जिनकी प्रिय पत्नी प्रेम से भरी सीता देवी हैं, जिनके पुत्र का नाम अच्युतानंद है, और जो श्री चैतन्य के प्रेम के प्रवाह से पूर्ण रूप से भरे हुए हैं, उन श्रील अद्वैताचार्य की मैं शरण लेता हूँ।
श्लोक 7
नित्यानंद से अभिन्न होने के कारण जिनका नाम 'अद्वैत' हुआ, भक्ति मार्ग का निरंतर प्रचार करने के कारण जिनका नाम 'आचार्य' हुआ, और जिनका मन सदा गौरधाम में विचरण करता है, उन श्रील अद्वैताचार्य की मैं शरण लेता हूँ।
श्लोक 8
जो शुद्ध बुद्धि से प्रतिदिन प्रातःकाल सीतानाथ (अद्वैताचार्य) के इस अष्टक का प्रेमपूर्वक पाठ करता है, वह उनके चरण कमलों में भक्ति प्राप्त करता है और उनका प्रिय बनता है।
श्लोक 9
इस प्रकार सार्वभौम भट्टाचार्य द्वारा रचित अद्वैताष्टक समाप्त होता है।
श्लोक 10
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
बुधवार, गुरुवार एवं एकादशी तिथि
प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) अथवा संध्या वेला
तुलसी दल, माखन-मिश्री का भोग, पीले पुष्प एवं चंदन
- परम भक्ति, मानसिक आनंद, भय-चिंता से मुक्ति एवं आत्मिक शांति
पृष्ठभूमि
यह स्तोत्र गौड़ीय वैष्णव परंपरा से जुड़ा है, जिसमें भगवान चैतन्य और उनके सहयोगियों की पूजा की जाती है। श्रील अद्वैताचार्य को भगवान चैतन्य के अवतार में सहायक माना जाता है। इस अष्टक का पाठ प्रायः सुबह के समय किया जाता है, और इसे पढ़ने से भक्ति और श्रील अद्वैताचार्य के प्रति प्रेम बढ़ने की मान्यता है। रचयिता सार्वभौम भट्टाचार्य एक प्रमुख संत और विद्वान थे, जिन्होंने चैतन्य महाप्रभु से प्रेरित होकर इसकी रचना की।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Adi Shankaracharya · शास्त्रीय दार्शनिक-संत · 8वीं शताब्दी ईस्वी, कालडी (केरल)
केरल के कालडी में जन्मे दार्शनिक एवं संन्यासी, जिन्हें अद्वैत वेदांत (अद्वैत दर्शन) को व्यवस्थित करने तथा भारत भर में चार मठों की स्थापना करने का श्रेय दिया जाता है। उपनिषदों एवं ब्रह्मसूत्रों पर अपनी टीकाओं के साथ-साथ, उन्होंने विभिन्न देवताओं की स्तुति में शास्त्रीय संस्कृत में अनेक भक्ति स्तोत्र रचे।
क्या आप जानते हैं?
रचयिता
यह अद्वैताष्टक संस्कृत डॉक्यूमेंट्स के पाठ में श्री सार्वभौम भट्टाचार्य की रचना बताया गया है। वे महान विद्वान एवं नैयायिक थे और गौड़ीय परंपरा के अनुसार पुरी में श्री चैतन्य महाप्रभु के भक्त बने।
अष्टक का स्वरूप
इसमें आठ श्लोक (अष्टक) हैं, जो श्री अद्वैत आचार्य की महिमा का गान करते हैं। नौवां श्लोक फलश्रुति है, जो इसके पाठ का लाभ बताता है।
श्री अद्वैत आचार्य का स्वरूप
शास्त्रों में इन्हें महाविष्णु का अवतार माना गया है। पाँचवें श्लोक के अनुसार, ब्रह्मा, विष्णु और शिव भी इन्हीं के विभिन्न रूप हैं, जो सृष्टि, स्थिति और संहार का कार्य करते हैं।
गौर-अवतरण में भूमिका
श्री अद्वैत आचार्य ने गंगा तट पर तुलसीदल और प्रेमपूर्ण हुङ्कार (ऊँची आवाज में पुकार) से श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रकट होने का आह्वान किया। उनकी हुङ्कार से आकर्षित होकर ही गौरांग नवद्वीप में अवतरित हुए।
परिवार और भक्ति
इनकी पत्नी श्री सीता देवी तथा पुत्र श्री अच्युतानंद भी प्रेम-भक्ति में पूर्ण थे। अद्वैत आचार्य स्वयं भक्ति के आचार्य (गुरु) तथा नित्यानंद से अभिन्न (अद्वैत) माने गए हैं।
पाठ का लाभ
नौवें श्लोक में वर्णित है कि जो प्रतिदिन प्रातःकाल शुद्ध बुद्धि से इस अद्वैताष्टक का पाठ करता है, वह अद्वैत आचार्य के चरणकमलों की समानता प्राप्त करता है और उनकी प्रिय भक्ति तथा उनके प्रियजनों का स्थान पाता है।
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