गौड़ीय वैष्णव प्रार्थना संग्रह
गौड़ीय वैष्णव परंपरा के प्रार्थना-श्लोक, जिनमें गुरु, रूप गोस्वामी, श्रीराधा-कृष्ण, वैष्णवों और हरे कृष्ण महामंत्र की वंदना है।
श्लोक
जिन्होंने अज्ञानरूपी अंधकार से अंधे हुए मुझे ज्ञानरूपी अंजन की शलाका से आँखें खोल दीं, उन श्रीगुरु को मेरा नमस्कार है।
श्लोक 1
जो श्रीचैतन्य महाप्रभु के मन में रमण करके इस पृथ्वी पर भक्ति-धर्म की स्थापना करने वाले हैं, वे स्वयं श्रीरूप गोस्वामी कब मुझे मेरी अभीष्ट कामना देंगे?
श्लोक 2
मैं अपने श्रीगुरु के श्रीयुत चरणकमलों की, सभी श्रीगुरुओं और वैष्णवों की वंदना करता हूँ; अग्रज सनातन सहित श्रीरूप की, रघुनाथ तथा गणों से युक्त उनकी और श्रीजीव सहित उनकी वंदना करता हूँ; अद्वैत, अवधूत (नित्यानंद) तथा परिजनों सहित श्रीकृष्णचैतन्य देव की वंदना करता हूँ; तथा ललिता और श्रीविशाखा सहित सखी-गणों के साथ श्रीराधा-कृष्ण के चरणकमलों की वंदना करता हूँ।
श्लोक 3
हे कृष्ण! हे करुणा सागर! हे दीनबन्धु! हे जगत्पति! हे गोपेश! हे गोपिकाकांत! हे राधाकांत! आपको मेरा नमस्कार है।
श्लोक 4
हे तपाए हुए सुवर्ण के समान गौर वर्ण वाली राधे! हे वृन्दावनेश्वरी! हे वृषभानु की पुत्री! हे देवी! हे हरिप्रिये! मैं आपको प्रणाम करता हूँ।
श्लोक 5
जो मनोकामनाओं के कल्पवृक्ष, कृपा के सागर और पतितों को पवित्र करने वाले हैं, उन वैष्णवों को बार-बार नमस्कार है।
श्लोक 6
श्रीकृष्ण चैतन्य प्रभु की जय हो, नित्यानंद प्रभु की जय हो; श्रीअद्वैत, गदाधर और श्रीवास आदि गौरभक्त-समूह की जय हो।
श्लोक 7
हे राधे! हे कृष्ण! हे राम! मैं आपकी शरण ग्रहण करता हूँ, कृपया मुझे अपनी भक्ति प्रदान कीजिए।
श्लोक 8
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
बुधवार, गुरुवार एवं एकादशी तिथि
प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) अथवा संध्या वेला
तुलसी दल, माखन-मिश्री का भोग, पीले पुष्प एवं चंदन
- परम भक्ति, मानसिक आनंद, भय-चिंता से मुक्ति एवं आत्मिक शांति
पृष्ठभूमि
यह प्रार्थना गौड़ीय वैष्णव परंपरा में प्रसिद्ध है, जिसे प्रायः साधना के आरंभ में या दैनिक पूजा में पढ़ा जाता है। इसमें गुरु, श्रीकृष्ण चैतन्य, श्रीराधा-कृष्ण, तथा वैष्णवों की वंदना की गई है, और अंत में हरे कृष्ण महामंत्र का उच्चारण है। यह क्रम गौड़ीय परंपरा की भक्ति, सरलता और श्रद्धा को दर्शाता है। आरंभ का गुरु-प्रणाम श्लोक भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर द्वारा संकलित श्री गौड़ीय कण्ठहार के गुरु-तत्त्व अध्याय में श्लोक 1.37 के रूप में भी उद्धृत है। अंत का महामंत्र कृष्ण यजुर्वेद की कलिसन्तरण उपनिषद् का सोलह नामों वाला मंत्र है, जिसमें पहले हरे राम वाली पंक्ति और फिर हरे कृष्ण वाली पंक्ति आती है।
गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय से और
क्या आप जानते हैं?
प्रथम श्लोक का महत्व
यह श्लोक 'गुरु-स्तुति' है और इसे प्रायः पूजा-पाठ के आरंभ में बोला जाता है। इसमें गुरु को वह व्यक्ति बताया गया है जो अज्ञान रूपी अंधकार में डूबे शिष्य की आँखों में ज्ञान का अंजन डालकर उन्हें खोलता है। यह छंद 'श्री गुरु चरन पद्म' से भी प्रसिद्ध है।
द्वितीय श्लोक में रूप गोस्वामी का उल्लेख
यह श्लोक श्री चैतन्य महाप्रभु के मनोभाव को पृथ्वी पर स्थापित करने वाले श्री रूप गोस्वामी को समर्पित है। चैतन्य महाप्रभु ने स्वयं रूप गोस्वामी को वृंदावन में भक्ति का प्रचार करने का आदेश दिया था। 'स्वयं रूपः' से स्पष्ट है कि वे चैतन्य के ही विस्तार माने जाते हैं।
विस्तृत वंदना (तीसरा श्लोक)
यह छंद एक साथ गुरु, वैष्णव, रूप गोस्वामी, उनके बड़े भाई (सनातन), रघुनाथ दास, रघुनाथ भट्ट, गोपाल भट्ट, जीव गोस्वामी, अद्वैत, नित्यानंद, अवधूत, और श्री राधा-कृष्ण के साथ ललिता और विशाखा को वंदन करता है। इससे पता चलता है कि गौड़ीय वैष्णव परंपरा में सभी को समान रूप से आदर दिया जाता है।
राधा के लिए विशेष श्लोक (पाँचवाँ)
यहाँ राधा को 'तप्तकाञ्चनगौराङ्गी' (तपे हुए सोने के समान गौर वर्ण वाली) और 'वृन्दावनेश्वरी' (वृंदावन की रानी) कहा गया है। वृषभानु की पुत्री होने के कारण उन्हें 'वृषभानुसुते' कहा गया है। यह श्लोक उनकी दिव्यता और कृष्ण प्रति प्रेम को उजागर करता है।
हरे कृष्ण महामंत्र (अंतिम श्लोक)
यह सोलह शब्दों का महामंत्र कलियुग के लिए सबसे सरल और प्रभावी साधन माना जाता है। इसे श्री चैतन्य महाप्रभु ने प्रचारित किया। इसमें 'हरे' शब्द भगवान की दिव्य शक्ति (राधा) को संबोधित है, और 'कृष्ण' और 'राम' नाम स्वयं भगवान के। यह मंत्र गौड़ीय वैष्णवों का प्रमुख जप है।
Krishna
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