श्रीगौरांग एवं उनके पार्षदों का नाम-संकीर्तन
यह एक पवित्र नाम-संकीर्तन है जिसमें श्री चैतन्य महाप्रभु तथा उनके प्रमुख भक्तों — श्री अद्वैत, श्री गदाधर, श्री श्रीवास आदि — के नामों का उच्चारण किया जाता है। इसका उद्देश्य भक्ति-भाव से उनका स्मरण करना है।
श्लोक
श्रीकृष्णचैतन्य प्रभु को, उनके धाम को, नित्यानंद प्रभु को, श्री अद्वैताचार्य को, गदाधार को, श्रीवास आदि गौरभक्तों के समूह को मेरा सादर प्रणाम है।
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
बुधवार, गुरुवार एवं एकादशी तिथि
प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) अथवा संध्या वेला
तुलसी दल, माखन-मिश्री का भोग, पीले पुष्प एवं चंदन
- परम भक्ति, मानसिक आनंद, भय-चिंता से मुक्ति एवं आत्मिक शांति
पृष्ठभूमि
यह नाम-संकीर्तन गौड़ीय वैष्णव परंपरा से जुड़ा है, जिसमें श्री चैतन्य महाप्रभु और उनके प्रमुख पार्षदों — श्री अद्वैत, श्री गदाधर, श्री श्रीवास आदि — के नामों का सम्मिलित रूप से उच्चारण किया जाता है। इसका प्रयोग प्रायः सामूहिक कीर्तन में, विशेषकर गौर-पूर्णिमा या अन्य वैष्णव पर्वों पर, भक्तिभाव से होता है। यह नामावली श्री चैतन्य के अनुगामियों द्वारा रचित मानी जाती है।
गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय से और
क्या आप जानते हैं?
पंचतत्त्व का संकेत
इस पंक्ति में श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु, नित्यानंद प्रभु, अद्वैताचार्य, गदाधर पंडित और श्रीवास ठाकुर — ये पाँचों मिलकर 'पंचतत्त्व' कहलाते हैं। गौड़ीय वैष्णव परंपरा में इन्हें भगवान के ही विभिन्न रूप माना जाता है, जो संयुक्त रूप से भक्ति आंदोलन का प्रचार करते हैं।
चैतन्य महाप्रभु का स्थान
श्रीकृष्ण चैतन्य (1486–1534) को उनके अनुयायी स्वयं भगवान कृष्ण का अवतार मानते हैं, जिन्होंने भक्ति के माध्यम से प्रेम और आनंद का संदेश फैलाया। उनका जन्म नवद्वीप (पश्चिम बंगाल) में हुआ था और उन्होंने संस्कृत, अद्वैत वेदांत तथा कीर्तन परंपरा को एक नई दिशा दी।
नित्यानंद प्रभु की भूमिका
नित्यानंद को चैतन्य महाप्रभु का प्रमुख सहयोगी और 'बलराम' का अवतार माना जाता है। वे अपनी उदारता और सबको भक्ति में शामिल करने के लिए प्रसिद्ध हैं — उन्होंने पतित-पावन होकर सबसे नीच समझे जाने वाले लोगों को भी भक्ति का अधिकार दिया।
अद्वैत, गदाधर और श्रीवास का महत्व
अद्वैताचार्य एक प्रभावशाली विद्वान थे जिन्होंने कृष्ण-भक्ति के लिए चैतन्य के अवतरण की प्रार्थना की। गदाधर पंडित को लक्ष्मी (राधा) का अंश और भक्ति की शक्ति का प्रतीक माना जाता है। श्रीवास ठाकुर चैतन्य के प्रथम अनुयायियों में से थे और उनके घर पर ही प्रसिद्ध नाम-कीर्तन की शुरुआत हुई।
Krishna
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