आहे नीलशैल (हे नीलाचल बिहारी जगन्नाथ)
भक्तकवि सालबेग का १७वीं सदी का ओड़िया 'जणाण', जिसमें वे नीलशैल जगन्नाथ से अपने जीवन के दुःखों को कुचल देने की प्रार्थना करते हैं।
श्लोक
हे नीलाचल के स्वामी (जगन्नाथ), आप एक अत्यंत बलशाली मतवाले हाथी के समान हैं! मेरे दुःखरूपी कमलों के सघन वन को अपने पैरों तले कुचलकर नष्ट कर दीजिए!
श्लोक 1
जब गजराज गहरे अथाह जल में ग्राह (मगरमच्छ) द्वारा पकड़े जाने पर घोर संकट में पड़ा, तब आपने अपना सुदर्शन चक्र चलाकर उस ग्राह का वध किया और स्वयं उसका उद्धार किया।
श्लोक 2
भयानक वन में जब असहाय मृगी दावानल और व्याध के भीषण संकट में घिर गई थी, तब आपने कितनी भारी विपत्ति से उसकी रक्षा की थी!
श्लोक 3
कौरवों की भरी सभा में जब द्रौपदी ने आपको पुकारा, तब आपने करोड़ों वस्त्र प्रदान करके सहज ही उसके शील और सम्मान की लाज रखी।
श्लोक 4
जब रावण का भाई विभीषण आपकी शरण में आया, तब आपने उसके शरणागत भाव की रक्षा की और उसे लंका का राजा बना दिया।
श्लोक 5
प्रह्लाद का पिता (हिरण्यकशिपु) अत्यंत दुष्ट और क्रूर था; आपने खंभे को चीरकर नृसिंह रूप में प्रकट होकर तत्क्षण उसका वध कर दिया।
श्लोक 6
सालबेग कहता है: मैं जाति से हीन यवन (मुसलमान) हूँ; फिर भी भगवान श्रीरंग (जगन्नाथ) के परम पावन चरणों में अपनी दीन प्रार्थना अर्पित कर रहा हूँ!
श्लोक 7
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
फलश्रुतिनित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
ओड़िशा के भक्तकवि सालबेग, १७वीं सदी के ओड़िया भक्त, जिनका जन्म एक मुस्लिम पिता और ओड़िया ब्राह्मणी माता के घर हुआ, द्वारा रचित 'आहे नीलशैल' ओड़िया भक्ति साहित्य का सर्वोत्कृष्ट रत्न है। श्रीमंदिर में प्रवेश न कर पाने पर उन्होंने मंदिर के बाहर बड़ दाण्ड (मुख्य मार्ग) से जगन्नाथ जी को 'नीलशैल' कहकर पुकारा और उनकी तुलना एक मतवाले गजराज से की, जो उनके दुःखरूपी कमल-वन को कुचल दे। गीत में भागवत पुराण के गजेंद्र और प्रह्लाद, महाभारत की द्रौपदी, रामायण के विभीषण तथा वन की मृगणी की रक्षा का भावपूर्ण स्मरण है।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Bhaktakavi Salabega
स्रोत: archive.org
विशिष्टाद्वैत (श्री वैष्णव सम्प्रदाय) से और
क्या आप जानते हैं?
कवि सालबेग का जीवन
१७वीं सदी के ओड़िया भक्तकवि सालबेग का जन्म एक मुस्लिम पिता और ओड़िया ब्राह्मणी माता के यहाँ हुआ था। वे भगवान जगन्नाथ के अनन्य और परम प्रेमी भक्त बने।
बड़ दाण्ड से भक्ति
श्रीमंदिर में प्रवेश न कर पाने पर उन्होंने पुरी के 'बड़ दाण्ड' (मुख्य मार्ग) पर बैठकर अपने आंसुओं से प्रभु की वंदना की। मान्यता है कि रथयात्रा में प्रभु का रथ सालबेग की प्रतीक्षा में रुक गया था।
मत्त हाथी और कमल-वन का रूपक
प्रभु को 'नीलशैल' कहकर एक बलशाली मतवाले हाथी की उपमा दी गई है, जो संसार के दुःखरूपी कमल-वन को अपने पैरों तले कुचलकर नष्ट कर दे।
पाँच उद्धार
दूसरे से छठे पद तक गजेंद्र मोक्ष, वन में घिरी मृगणी, भरी सभा में द्रौपदी की लाज, विभीषण की शरणागति और खंभे से प्रकट होकर प्रह्लाद की रक्षा का वर्णन है।
दीनभाव से शरणागति
अंतिम पद में सालबेग अपनी जन्म-पहचान स्वीकारते हुए कहते हैं: 'कहे सालबेग हीन जातिरे मुँ जवन', और फिर भी प्रभु के श्रीचरणों में विनती करते हैं।
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