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Embroidered artwork for अदिवो अल्लदिवो (देखो वह श्रीहरि का पावन धाम): Embroidered Om symbol above a brass diya, marigolds and a temple spire at sunrise

अदिवो अल्लदिवो (देखो वह श्रीहरि का पावन धाम)

भजनविशिष्टाद्वैत (श्री वैष्णव सम्प्रदाय)भगवान विष्णुवेंकटेश्वर

अदिवो अल्लदिवो (देखो वह श्रीहरि का पावन धाम)

ताल्लपाक अन्नमाचार्य का तेलुगु संकीर्तन, जिसमें तिरुमला की सात पहाड़ियाँ श्रीहरि वेंकटेश्वर का साक्षात निवास बताई गई हैं।

श्लोक

अदिवो अल्लदिवो श्रीहरिवासमु पदिवेल शेषुल पडगलमयमु
Adivo Alladivo Sriharivasamu Padivela Sheshula Padagalamayamu

श्लोक 1

अदॆ वेंकटाचल मखिलोन्नतमु अदिवो ब्रह्मादुल कपुरूपमु अदिवो नित्यनिवास मखिलमुनुलकु अदॆ चूडुँडदॆ म्रॊक्कुडानंदमयमु
Ade Venkatachala Makhilonnatamu Adivo Brahmadulakapurupamu Adivo Nityanivasa Makhilamunulaku Ade Choodudade Mrokkudanandamayamu

श्लोक 2

चॆंगट नल्लदिवो शेषाचलमु निंगि नुन्नदेवतल निजवासमु मुंगिट नल्लदिवो मूलनुन्नधनमु बंगारु शिखराल बहु ब्रह्ममयमु
Chengata Nalladivo Sheshachalamu Ningi Nunnadevatala Nijavasamu Mungita Nalladivo Moolanunnadhanamu Bangaru Shikharala Bahu Brahmamayamu

श्लोक 3

कैवल्यपदमु वेंकटनगमदिवो श्री वेंकटपतिकि सिरुलैनवि भाविंप सकलसंपदरूपमदिवो पावनमुलकॆल्ल पावनमयमु
Kaivalyapadamu Venkatanagamadivo Sri Venkatapatiki Sirulainavi Bhavimpa Sakalasampadaroopamadivo Pavanamulakella Pavanamayamu

श्लोक 4

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

फलश्रुति
शुभ दिन व तिथि

नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर

उत्तम मुहूर्त / समय

ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल

पूजन सामग्री व अर्पण

शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभफलश्रुति
  • मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार

पृष्ठभूमि

परंपरा के अनुसार जब युवा अन्नमाचार्य (1408-1503) पहली बार तिरुमला पर्वत पर पहुँचे, तो उन्हें संपूर्ण पर्वतमाला सामान्य पाषाण नहीं, अपितु दिव्य सर्प आदिशेष का साक्षात रूप प्रतीत हुई। भावविभोर होकर उन्होंने गाया: 'अदिवो अल्लदिवो श्रीहरिवासमु!' (देखो, वह श्रीहरि का पावन धाम है!)। अन्नमाचार्य के संकीर्तन उनके वंशजों द्वारा ताम्रपत्रों पर उत्कीर्ण कराए गए और तिरुमला मंदिर में सुरक्षित रखे गए। राग मध्यमावती और आदि ताल में निबद्ध यह पद शेषाचल को मोक्षदायक परम तीर्थ बताता है। वराह पुराण और स्कन्द पुराण तिरुमला की पहाड़ियों को भगवान विष्णु के वराह अवतार से जोड़ते हैं, और परंपरा इस पर्वतमाला को शेषनाग का शरीर मानती है, इसी कारण इसे शेषाचल भी कहा जाता है।

इस पाठ के विषय में

रचयिता: Tallapaka Annamacharya

स्रोत: stotranidhi.com

क्या आप जानते हैं?

रचना की पृष्ठभूमि

मान्यता है कि युवा अन्नमाचार्य ने जब पहली बार तिरुपति की सात पहाड़ियों का दर्शन किया, तब भावातिरेक में उनके मुख से यह दिव्य कीर्तन फूटा।

आदिशेष का स्वरूप

प्रथम पद में तिरुमला पर्वत की चोटियों को दस हज़ार फणों वाले शेषनाग का विस्तार बताया गया है (पदिवेल शेषुल पडगलमयमु)।

आँगन का परम धन

अन्नमय्या भगवान वेंकटेश्वर को 'घर के कोने में रखा हुआ साक्षात खजाना' कहते हैं, जो निष्कपट भक्तों को अनायास ही सुलभ हो जाता है।

स्वर्ण शिखर

पद में तिरुमला मंदिर के जगमगाते स्वर्ण शिखरों और वहाँ ब्रह्मादि देवताओं के नित्य आगमन का नयनाभिराम वर्णन है।

कर्नाटक संगीत में स्थान

राग मध्यमावती में निबद्ध यह संकीर्तन अन्नमाचार्य के सर्वाधिक प्रिय पदों में है और अन्नमय्या कार्यक्रमों तथा कर्नाटक संगीत समारोहों का नियमित अंग है।

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