अदिवो अल्लदिवो (देखो वह श्रीहरि का पावन धाम)
ताल्लपाक अन्नमाचार्य का तेलुगु संकीर्तन, जिसमें तिरुमला की सात पहाड़ियाँ श्रीहरि वेंकटेश्वर का साक्षात निवास बताई गई हैं।
श्लोक
देखो! वहाँ देखो, वह साक्षात भगवान श्रीहरि का पावन धाम है! वह सहस्रों फणों वाले आदिशेष का ही प्रत्यक्ष स्वरूप है!
श्लोक 1
वही है वेंकटाचल पर्वत, जो समस्त पर्वतों में सर्वोच्च है! ब्रह्मा आदि देवताओं के लिए भी यह दर्शन अत्यंत दुर्लभ है; यह समस्त मुनियों का नित्य निवास-स्थल है। उसे देखो, श्रद्धा से नमन करो और परमानंद प्राप्त करो!
श्लोक 2
समीप ही वह शेषाचल पर्वत है, जो स्वर्ग के देवताओं का वास्तविक निवास है! देखो, घर के कोने में छुपा हुआ अमूल्य खजाना आज हमारे आँगन में प्रत्यक्ष सुलभ हो गया है; इसके स्वर्ण शिखर साक्षात ब्रह्ममय होकर चमक रहे हैं!
श्लोक 3
देखो, यह वेंकटाचल पर्वत साक्षात कैवल्य (मोक्ष) का धाम है! यह भगवान श्री वेंकटेश्वर का परम वैभव है; इसका ध्यान करने से समस्त संपदाओं का फल प्राप्त होता है, यह समस्त पावन तीर्थों में परम पावन है!
श्लोक 4
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
फलश्रुतिनित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
परंपरा के अनुसार जब युवा अन्नमाचार्य (1408-1503) पहली बार तिरुमला पर्वत पर पहुँचे, तो उन्हें संपूर्ण पर्वतमाला सामान्य पाषाण नहीं, अपितु दिव्य सर्प आदिशेष का साक्षात रूप प्रतीत हुई। भावविभोर होकर उन्होंने गाया: 'अदिवो अल्लदिवो श्रीहरिवासमु!' (देखो, वह श्रीहरि का पावन धाम है!)। अन्नमाचार्य के संकीर्तन उनके वंशजों द्वारा ताम्रपत्रों पर उत्कीर्ण कराए गए और तिरुमला मंदिर में सुरक्षित रखे गए। राग मध्यमावती और आदि ताल में निबद्ध यह पद शेषाचल को मोक्षदायक परम तीर्थ बताता है। वराह पुराण और स्कन्द पुराण तिरुमला की पहाड़ियों को भगवान विष्णु के वराह अवतार से जोड़ते हैं, और परंपरा इस पर्वतमाला को शेषनाग का शरीर मानती है, इसी कारण इसे शेषाचल भी कहा जाता है।
इस पाठ के विषय में
विशिष्टाद्वैत (श्री वैष्णव सम्प्रदाय) से और
क्या आप जानते हैं?
रचना की पृष्ठभूमि
मान्यता है कि युवा अन्नमाचार्य ने जब पहली बार तिरुपति की सात पहाड़ियों का दर्शन किया, तब भावातिरेक में उनके मुख से यह दिव्य कीर्तन फूटा।
आदिशेष का स्वरूप
प्रथम पद में तिरुमला पर्वत की चोटियों को दस हज़ार फणों वाले शेषनाग का विस्तार बताया गया है (पदिवेल शेषुल पडगलमयमु)।
आँगन का परम धन
अन्नमय्या भगवान वेंकटेश्वर को 'घर के कोने में रखा हुआ साक्षात खजाना' कहते हैं, जो निष्कपट भक्तों को अनायास ही सुलभ हो जाता है।
स्वर्ण शिखर
पद में तिरुमला मंदिर के जगमगाते स्वर्ण शिखरों और वहाँ ब्रह्मादि देवताओं के नित्य आगमन का नयनाभिराम वर्णन है।
कर्नाटक संगीत में स्थान
राग मध्यमावती में निबद्ध यह संकीर्तन अन्नमाचार्य के सर्वाधिक प्रिय पदों में है और अन्नमय्या कार्यक्रमों तथा कर्नाटक संगीत समारोहों का नियमित अंग है।
Vishnu
हिन्दू धर्म से और
सभी देखेंसंबंधित शिक्षाएं
एक ही शिक्षा, विभिन्न परंपराओं में प्रतिध्वनित
