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Embroidered artwork for गोपालबाल स्तोत्र: Embroidered Om symbol above a brass diya, marigolds and a temple spire at sunrise

गोपालबाल स्तोत्र

गोपालबाल स्तोत्र

अन्नमाचार्य की संस्कृत कीर्तना, जिसमें घुँघरू और माखन वाले बाल कृष्ण (गोपालबाल) का तिरुमला-निवासी हरि के रूप में ध्यान है।

श्लोक

भावयामि गोपालबालं मन-स्सेवितं तत्पदं चिन्तयेहं सदा
Bhavayami Gopalabalam Mana-Sevitam Tatpadam Chintayeham Sada

श्लोक 1

कटि घटित मेखला खचितमणि घण्टिका- पटल निनदेन विभ्राजमानं कुटिल पद घटित सङ्कुल शिञ्जितेनतं चटुल नटना समुज्ज्वल विलासं
Kati Ghatita Mekhala Khachitamani Ghantika- Patala Ninadena Vibhrajamanam Kutila Pada Ghatita Sankula Shinjitenatam Chatula Natana Samujjwala Vilasam

श्लोक 2

निरतकर कलित नवनीतं ब्रह्मादि सुर निकर भावना शोभित पदं तिरुवेङ्कटाचल स्थितं अनुपमं हरिं परम पुरुषं गोपालबालं
Nirata Kara Kalita Navaneetam Brahmadi Sura Nikara Bhavana Shobhita Padam Tiruvenkatachala Sthitam Anupamam Harim Parama Purusham Gopalabalam

श्लोक 3

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

शुभ दिन व तिथि

बुधवार, गुरुवार एवं एकादशी तिथि

उत्तम मुहूर्त / समय

प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) अथवा संध्या वेला

पूजन सामग्री व अर्पण

तुलसी दल, माखन-मिश्री का भोग, पीले पुष्प एवं चंदन

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ
  • परम भक्ति, मानसिक आनंद, भय-चिंता से मुक्ति एवं आत्मिक शांति

पृष्ठभूमि

यह संस्कृत कीर्तना परंपरा से तल्लपाक अन्नमाचार्य (लगभग 1408–1503) की रचना मानी जाती है, जिन्होंने तिरुमला के भगवान वेंकटेश्वर के लिए हजारों संकीर्तन रचे; ऐसा कहा जाता है कि उनकी संख्या लगभग 32,000 है, अधिकांश तेलुगु में और कुछ संस्कृत में। यह वैष्णव भक्ति-परंपरा की रचना है: नाचते, माखन थामे बालक का चित्र भागवत पुराण (स्कन्ध 10) के बाल कृष्ण से जुड़ता है और पाठ उन्हें तिरुवेंकटाचल पर स्थित बताता है। इसे संगीत-सभाओं, मंदिरों और जन्माष्टमी जैसे उत्सवों पर वात्सल्य-भाव से गाया जाता है।

इस पाठ के विषय में

क्या आप जानते हैं?

रचयिता और परंपरा

परंपरा इस कीर्तना को तल्लपाक अन्नमाचार्य की रचना मानती है। यहाँ गोपालबाल (बाल कृष्ण) को तिरुवेंकटाचल पर स्थित हरि के रूप में चित्रित किया गया है, जो कृष्ण और वेंकटेश्वर की एकता की ओर संकेत करता है।

लय और सौंदर्य

दूसरे श्लोक में कमरबंद की घंटियों की झंकार और नृत्य के चटुल विलास का वर्णन है। यह बाल कृष्ण की मासूमियत और लीलाओं को ऐसे शब्दों में चित्रित करता है कि पाठक मानसिक रूप से उनकी मनोहर मूर्ति को देख सके।

प्रतीक का महत्व

'नवनीत' (माखन) का उल्लेख कृष्ण की प्रसिद्ध बाल लीला को दर्शाता है। साथ ही, ब्रह्मा आदि देवताओं का उनके चरणों में भावना करना, यह स्थापित करता है कि बाल रूप में भी वे परम पुरुष हैं।

भारतीय दर्शन

'भावयामि' (ध्यान करता हूँ) और 'चिन्तये' (चिंतन करता हूँ) शब्दों से यह स्तोत्र ध्यान योग की प्रक्रिया को दर्शाता है। इसे पढ़ने या सुनने वाला कृष्ण के प्रति एकाग्रता और भक्ति में लीन हो जाता है।

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