Bharat Devotion
Embroidered artwork for ज्योत से ज्योत: Embroidered Om symbol above a brass diya, marigolds and a temple spire at sunrise

ज्योत से ज्योत

ज्योत से ज्योत

फिल्म 'संत ज्ञानेश्वर' (1964) का भरत व्यास-रचित भजन, जो प्रेम-प्रकाश फैलाने और सबमें एक ही आत्मा देखने की प्रेरणा देता है।

श्लोक

ज्योत से ज्योत जगाते चलो, प्रेम की गंगा बहाते चलो राह में आये जो दीन दुखी, सब को गले से लगाते चलो
Jyot Se Jyot Jagate Chalo, Prem Ki Ganga Bahate Chalo Raah Mein Aaye Jo Deen Dukhi, Sab Ko Gale Se Lagate Chalo

श्लोक 1

कौन है ऊँचा, कौन है नीचा, सब में वो ही समाया भेदभाव के झूठे भरम में ये मानव भरमाया धर्म ध्वजा फ़हराते चलो
Kaun Hai Uncha, Kaun Hai Neecha, Sab Mein Woh Hi Samaya Bhedbhav Ke Jhoothe Bharam Mein Ye Manav Bharmaya Dharm Dhwaja Phahrate Chalo

श्लोक 2

सारे जग के कणकण में है, दिव्य अमर एक आत्मा एक ब्रम्ह है, एक सत्य है, एक ही है परमात्मा प्राणों से प्राण मिलाते चलो
Saare Jag Ke Kan Kan Mein Hai, Divya Amar Ek Aatma Ek Brahm Hai, Ek Satya Hai, Ek Hi Hai Parmatma Praanon Se Praan Milate Chalo

श्लोक 3

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

शुभ दिन व तिथि

नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर

उत्तम मुहूर्त / समय

ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल

पूजन सामग्री व अर्पण

शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ
  • मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार

पृष्ठभूमि

यह गीत भरत व्यास (1918–1982) ने 1964 की हिंदी फिल्म 'संत ज्ञानेश्वर' के लिए लिखा, जिसका संगीत लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने दिया; मुकेश की आवाज़ वाला रूप सबसे प्रसिद्ध है। फिल्म मराठी संत ज्ञानेश्वर (ज्ञानेश्वरी के रचयिता, लगभग 1290) के जीवन पर आधारित है, किंतु यह गीत स्वयं आधुनिक फिल्मी रचना है, संत की वाणी नहीं। अब यह सत्संगों और सामूहिक आयोजनों में गाया जाता है, जिसमें करुणा, ऊँच-नीच के भेद से परे समता और सबमें एक परमात्मा के दर्शन का संदेश है।

इस पाठ के विषय में

रचयिता: Bharat Vyas

क्या आप जानते हैं?

भावार्थ

यह भजन प्रेम और एकता का संदेश देता है। पहली पंक्ति 'ज्योत से ज्योत जगाते चलो' का अर्थ है कि हमें अपने ज्ञान और प्रेम के प्रकाश को एक-दूसरे में फैलाते रहना चाहिए, ठीक वैसे ही जैसे एक दीपक से दूसरा दीपक जलाया जाता है। 'प्रेम की गंगा बहाते चलो' का तात्पर्य है कि अपने जीवन में प्रेम को निरंतर प्रवाहित रखें।

सामाजिक समानता

दूसरे पद में कहा गया है कि ऊँच-नीच का भेदभाव मिथ्या है क्योंकि सबमें एक ही परमात्मा समाया है। यह भजन जाति-पाँति और छुआछूत जैसी सामाजिक बुराइयों को दूर करने की प्रेरणा देता है। 'भेदभाव के झूठे भरम' शब्दों से स्पष्ट होता है कि ये सब अज्ञानता के कारण हैं।

आध्यात्मिक एकता

तीसरे पद में ब्रह्म, सत्य और परमात्मा को एक ही माना गया है। यह अद्वैत दर्शन का सार है कि संपूर्ण सृष्टि के कण-कण में एक ही आत्मा व्याप्त है। 'प्राणों से प्राण मिलाते चलो' का अर्थ है कि हमें सभी प्राणियों से अपने प्राणों का तादात्म्य स्थापित करना चाहिए।

रचना शैली

इस भजन में तीन पद हैं और प्रत्येक पद के अंत में एक समान भाव वाली पंक्ति ('चलो' से समाप्त) आती है, जो इसे गाने और याद करने में सरल बनाती है। यह एक सामान्य भजन संरचना है जिसमें एक समूह एक साथ गा सके। भाषा सरल और सहज है, जो आम जनता तक आसानी से पहुँचती है।

फिल्मी स्रोत

यह गीत 1964 की फिल्म 'संत ज्ञानेश्वर' का है; गीतकार भरत व्यास और संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल हैं। यह संत के आदर्शों से प्रेरित फिल्मी रचना है, स्वयं संत की रचना नहीं।

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