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इतनी शक्ति हमें देना दाता

इतनी शक्ति हमें देना दाता

फिल्म 'अंकुश' (1986) की अभिलाष-रचित हिंदी प्रार्थना, जिसमें शक्ति, ज्ञान और निःस्वार्थ हृदय माँगा गया है; विद्यालयों में प्रसिद्ध।

श्लोक

इतनी शक्ति हमें देना दाता मन का विश्वास कमजोर हो ना हम चले नेक रस्ते पे हमसे भूलकर भी कोई भूल हो ना
Itni Shakti Hamen Dena Data Man Ka Vishwas Kamjor Ho Na Hum Chale Nek Raste Pe Humse Bhoolkar Bhi Koi Bhool Ho Na

श्लोक 1

दूर अज्ञान के हो अंधेरे तू हमें ज्ञान की रोशनी दे हर बुराई से बचते रहें हम जितनी भी दे भली ज़िन्दगी दे बैर हो ना किसी का किसी से भावना मन में बदले की हो ना
Door Agyan Ke Ho Andhere Tu Hamen Gyan Ki Roshni De Har Burai Se Bachte Rahen Hum Jitni Bhi De Bhali Zindagi De Bair Ho Na Kisi Ka Kisi Se Bhavna Man Mein Badle Ki Ho Na

श्लोक 2

हम ना सोचें हमें क्या मिला है हम ये सोचे किया क्या है अर्पण फूल खुशियों के बाँटे सभी को सब का जीवन ही बन जाए मधुबन अपनी करुणा का जल तू बहा के कर दे पावन हर एक मन का कोना
Hum Na Sochen Hamen Kya Mila Hai Hum Ye Sochen Kiya Kya Hai Arpan Phool Khushiyon Ke Baante Sabhi Ko Sab Ka Jeevan Hi Ban Jaaye Madhuban Apni Karuna Ka Jal Tu Baha Ke Kar De Paavan Har Ek Man Ka Kona

श्लोक 3

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

शुभ दिन व तिथि

नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर

उत्तम मुहूर्त / समय

ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल

पूजन सामग्री व अर्पण

शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ
  • मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार

पृष्ठभूमि

यह प्रार्थना गीतकार अभिलाष ने 1986 की हिंदी फिल्म 'अंकुश' के लिए लिखी, जिसका संगीत कुलदीप सिंह ने दिया। यह मूलतः फिल्मी गीत है, पारंपरिक भजन नहीं, फिर भी विद्यालयों, सत्संगों और दैनिक प्रार्थना में अत्यंत लोकप्रिय है। इसमें केवल अनाम 'दाता' को पुकारा गया है, इसलिए अनेक मतों के लोग इसे अपनाते हैं। यह नैतिक शक्ति, ज्ञान, क्षमा और निःस्वार्थता की याचना करती है।

इस पाठ के विषय में

रचयिता: Abhilash

क्या आप जानते हैं?

फिल्मी स्रोत

यह प्रार्थना फिल्म 'अंकुश' (1986) के लिए लिखी गई थी। गीतकार अभिलाष हैं और संगीत कुलदीप सिंह का है। फिल्म से निकलकर यह विद्यालयों और सत्संगों की प्रार्थना बन गई।

सार्वभौमिक संबोधन

गीत में किसी विशेष देवता का नाम नहीं, केवल 'दाता' (देने वाले) को पुकारा गया है, इसीलिए इसे अलग-अलग परंपराओं में गाया जाता है। सरल धुन और सारगर्भित शब्द इसे सामूहिक गायन के अनुकूल बनाते हैं।

प्रार्थना का स्वरूप

यह तीन छंदों में बँटी है – पहले में शक्ति और विश्वास, दूसरे में ज्ञान, अहंकार-रहित जीवन और क्षमा, तीसरे में निःस्वार्थ सेवा और करुणा की याचना है। हर छंद में एक सामूहिक 'हम' का प्रयोग है, जो व्यक्तिगत नहीं, बल्कि समाज के लिए प्रार्थना को दर्शाता है।

प्रमुख भावना

'बैर हो ना किसी का किसी से' – यह पंक्ति समस्त मानवता के प्रति अद्वेष का संदेश देती है। इसके अलावा 'फूल खुशियों के बाँटे सभी को' और 'सब का जीवन ही बन जाए मधुबन' में साझा सुख की कल्पना की गई है, जो इस प्रार्थना को सिर्फ़ माँगने नहीं, बल्कि देने की भावना से जोड़ता है।

आध्यात्मिक गहराई

'दूर अज्ञान के हो अंधेरे, तू हमें ज्ञान की रोशनी दे' – यह उपनिषदों के 'तमसो मा ज्योतिर्गमय (बृहदारण्यक उपनिषद् 1.3.28)' (अंधकार से प्रकाश की ओर ले चल) की याद दिलाता है। अंतिम पंक्ति 'अपनी करुणा का जल तू बहा के, कर दे पावन हर एक मन का कोना' मन के हर कोने को ईश्वरीय कृपा से शुद्ध करने की लालसा को व्यक्त करती है।

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