सदाचार और करुणा की प्रार्थना
पं. जुगलकिशोर मुख्तार 'युगवीर' की 1916 की जैन प्रार्थना: सबसे मैत्री, करुणा, समभाव और सदाचार में दृढ़ता का संकल्प।
श्लोक
जिसने राग, द्वेष, काम आदि सब विकारों को जीत लिया और सम्पूर्ण जगत को जान लिया, तथा बिना किसी स्वार्थ के सभी जीवों को मोक्ष के मार्ग का उपदेश दिया—उस परमात्मा को चाहे बुद्ध, वीर, जिन, हरि, हर, ब्रह्मा या स्वाधीन कहो, भक्ति-भाव से प्रेरित होकर यह चित्त उसी में लीन रहे।
श्लोक 1
जिनके मन में विषयों की कोई आशा नहीं है, जो समता-भाव को ही धन मानते हैं, जो अपने और पराए सबके हित-साधन में दिन-रात तत्पर रहते हैं, और स्वार्थ-त्याग रूपी कठिन तपस्या को बिना किसी खेद के करते हैं—ऐसे ज्ञानी साधु ही संसार के समस्त दुःखों को हर लेते हैं।
श्लोक 2
मेरा सदा सत्संग में वास रहे, उन्हीं महापुरुषों का ध्यान नित्य रहे, उन्हीं जैसी आचरण-पद्धति में यह चित्त सदा अनुरक्त रहे। मैं किसी भी जीव को न सताऊँ, कभी झूठ न बोलूँ, पराए धन और पराई स्त्री पर लुभाऊँ नहीं, और संतोष रूपी अमृत का सदा पान करता रहूँ।
श्लोक 3
मैं अहंकार का भाव न रखूँ, किसी पर क्रोध न करूँ, दूसरों की उन्नति देखकर कभी ईर्ष्या न करूँ। मेरी भावना ऐसी रहे कि मैं सरल और सत्य व्यवहार करूँ, और जहाँ तक संभव हो इस जीवन में दूसरों का उपकार करता रहूँ।
श्लोक 4
संसार के समस्त जीवों के प्रति मेरा मैत्री-भाव नित्य बना रहे, दीन-दुःखी जीवों के प्रति मेरे हृदय से करुणा की धारा निरंतर बहती रहे। दुर्जन, क्रूर और कुमार्ग पर चलने वालों पर मुझे कभी क्रोध न आए, उन पर भी मैं समभाव रखूँ—ऐसी ही मेरी परिणति हो जाए।
श्लोक 5
गुणी जनों को देखकर मेरे हृदय में प्रेम उमड़ आए, और जहाँ तक संभव हो उनकी सेवा करके मेरा मन सुख पाए। मैं कभी कृतघ्न न बनूँ, मेरे हृदय में किसी के प्रति द्रोह न आए। सदा गुण-ग्रहण की भावना रहे और मेरी दृष्टि कभी दोषों पर न जाए।
श्लोक 6
कोई मुझे बुरा कहे या अच्छा, लक्ष्मी आए या चली जाए, मैं लाखों वर्षों तक जीऊँ या आज ही मृत्यु आ जाए, अथवा कोई कैसा भी भय या लालच देने आए—तो भी न्याय के मार्ग से मेरा पैर कभी न डिगने पाए।
श्लोक 7
सुख में मग्न होकर मैं कभी फूलूँ नहीं और दुःख में कभी घबराऊँ नहीं। पर्वत, नदी, श्मशान या भयानक वन से मुझे कभी भय न लगे। यह मन अडोल और अकम्प होकर निरंतर दृढ़तर बन जाए, और इष्ट के वियोग तथा अनिष्ट के योग में भी सहनशीलता दिखाए।
श्लोक 8
संसार के सभी जीव सुखी रहें, किसी को कभी घबराहट न हो। सब लोग बैर, पाप और अभिमान छोड़कर नित्य नए मंगल गीत गाएँ। घर-घर में धर्म की चर्चा हो और बुरे कर्म करना कठिन हो जाए। ज्ञान और चरित्र को उन्नत करके सभी मनुष्य अपने जन्म का फल पा लें।
श्लोक 9
जगत में कोई आपत्ति और भय न व्यापे, वर्षा समय पर होती रहे। राजा भी धर्मनिष्ठ होकर प्रजा के साथ न्याय करे। रोग, मरी और दुर्भिक्ष न फैलें, प्रजा शांति से जीवन बिताए। परम अहिंसा-धर्म संसार में फैलकर सबका हित करता रहे।
श्लोक 10
जगत में परस्पर प्रेम फैले और मोह दूर ही रहे। कोई किसी से अप्रिय, कटु या कठोर शब्द न कहे। सब लोग हृदय से 'युगवीर' बनकर देश की उन्नति में तत्पर रहें, और वस्तु-स्वरूप का विचार करते हुए खुशी से सब दुःख और संकट सहन करें।
श्लोक 11
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
'मेरी भावना' दिगंबर जैन परंपरा की हिंदी प्रार्थना है, जिसकी रचना पं. जुगलकिशोर मुख्तार 'युगवीर' (1877–1968) ने की और जो अप्रैल 1916 में पहली बार प्रकाशित हुई। इसे जैन प्रार्थना और ध्यान में पढ़ा जाता है और समुदाय के बाहर भी यह अत्यंत प्रिय है। सब जीवों से मैत्री, गुणीजनों में प्रमोद, दुखियों पर करुणा और कुमार्ग-रतों पर माध्यस्थ भाव की कामना तत्त्वार्थ सूत्र 7.11 (दिगंबर क्रम) की चतुर्विध भावना से मेल खाती है, साथ में अहिंसा और अनासक्ति के मूल्य हैं।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Jugal Kishore Mukhtar 'Yugvir'
क्या आप जानते हैं?
रचना-परिचय
यह प्रार्थना पं. जुगलकिशोर मुख्तार ने 1916 में रची; 'युगवीर' उनका उपनाम है, जो अंतिम पद में आता है। यह जैन दर्शन की अहिंसा, समभाव और लोक-कल्याण की शिक्षा को सरल हिंदी में प्रस्तुत करती है। इसमें बुद्ध, महावीर (जिन), हरि, हर और ब्रह्मा सभी को एक समान आदर्श मानकर सार्वभौमिक आध्यात्मिक दृष्टि दी गई है।
पहला पद
पहले श्लोक में कहा गया है कि जिसने राग, द्वेष और कामना को जीत लिया, वही सच्चा ज्ञानी है और संसार को मोक्ष का मार्ग बताता है। यहाँ 'स्वाधीन' शब्द का अर्थ है आत्म-नियंत्रित व्यक्ति, जो बाहरी परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होता।
सातवाँ पद
'लाखों वर्षों तक जीऊँ या मृत्यु आज ही आ जावे' — यह पंक्ति गीता के 'न हि कल्याणकृत् कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति' के समान दृढ़ संकल्प को दर्शाती है कि धर्म-मार्ग से कभी विचलित नहीं होना चाहिए, चाहे जीवन लंबा हो या छोटा।
दसवाँ पद
इस पद में एक आदर्श समाज का चित्रण है जहाँ समय पर वर्षा होती है, राजा न्याय करता है, और कोई रोग या अकाल नहीं फैलता। यह जैन परंपरा के 'अहिंसा परमो धर्मः' सिद्धांत को सामाजिक स्तर पर लागू करने की कल्पना है।
अंतिम पद
'वस्तु-स्वरूप-विचार' का अर्थ है वस्तुओं के वास्तविक स्वरूप का विचार करना — यानी संसार की अस्थिरता को समझकर सुख-दुख को सहन करना। यह जैन दर्शन के 'सम्यक् दर्शन' (सही दृष्टि) का सरल रूप है, जो आत्म-विकास और देश-उन्नति दोनों पर जोर देता है।
भाषा-शैली
ये पद सरल हिंदी में लिखे गए हैं, जिसमें संस्कृत के तत्सम शब्दों का प्रयोग है। 'ईति' का अर्थ है विपत्ति (जैसे अकाल, महामारी) और 'भीति' का अर्थ है भय — इन दोनों से मुक्त समाज की कामना की गई है।
Mahavira
जैन धर्म से और
सभी देखेंसंबंधित शिक्षाएं
एक ही शिक्षा, विभिन्न परंपराओं में प्रतिध्वनित
