श्री महावीर आरती
जैन परंपरा की यह आरती भगवान महावीर के कुण्डलपुर में जन्म, उनकी दया-अहिंसा और नाम-स्मरण से कष्ट-मुक्ति का गुणगान करती है।
श्लोक
हे जगत के नायक, सुख देने वाले, अत्यंत गंभीर प्रभो! महावीर प्रभु की जय हो, स्वामी की जय हो। ॐ महावीर प्रभु की जय।
श्लोक 1
आप कुण्डलपुर में जन्मे, माता त्रिशला के पुत्र हुए। पिता राजा सिद्धार्थ थे, देवता और मनुष्य सब आनंदित हुए।
श्लोक 2
हे दीनों के नाथ, दया के भंडार, आप सबके कल्याणकारी हैं। जगत के हित के लिए आपने संयम धारण किया, प्रभु आप परोपकारी हैं।
श्लोक 3
आपने पापाचार को मिटाया और सत्पथ दिखाया। दया और धर्म का झंडा संसार में लहराया।
श्लोक 4
आपने अर्जुनमाली, गौतम और श्री चंदनबाला को संसार-सागर से पार उतारा।
श्लोक 5
हे संसार के तारणहार! आपका पवित्र नाम है। जो मनुष्य रात-दिन उसका ध्यान करता है, उसके सारे कष्ट मिट जाते हैं।
श्लोक 6
हे करुणा के सागर! आपकी महिमा निराली है। ज्ञानी मुनि आपके गुण गाते हैं, आपके चरणों पर बलिहार जाते हैं।
श्लोक 7
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
यह जैन भक्ति परंपरा की आरती है, जो चौबीसवें और अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर को समर्पित है। इसे मंदिरों और घरों में संध्या के समय तथा महावीर जयंती पर गाया जाता है। दूसरे पद में कल्पसूत्र में वर्णित महावीर के जन्म का स्मरण है, जो रानी त्रिशला और राजा सिद्धार्थ के पुत्र थे। अंतिम पद में रचनाकार ने अपना नाम 'ज्ञानमुनि' बताया है; वे कौन थे, यह निश्चित रूप से ज्ञात नहीं, इसलिए इसे अज्ञात काल की परंपरागत भक्ति रचना ही कहना उचित है।
क्या आप जानते हैं?
रचनाकार का नाम
आरती के अंतिम पद में 'ज्ञानमुनि गुण गावे' आता है, जिससे गायक-कवि का नाम ज्ञानमुनि प्रतीत होता है। वे किस परंपरा या काल के थे, यह निश्चित रूप से ज्ञात नहीं है, इसलिए रचयिता के विषय में इससे अधिक नहीं कहा जा सकता।
जन्म स्थान और माता-पिता
दूसरे पद के अनुसार भगवान महावीर का जन्म कुण्डलपुर (जैन परंपरा का कुण्डग्राम, वर्तमान बिहार) में हुआ। उनकी माता का नाम त्रिशला और पिता का नाम राजा सिद्धार्थ था, और उनके जन्म पर देवता और मनुष्य दोनों आनंदित हुए।
तीन नामित शिष्य
पाँचवें पद में अर्जुनमाली, गौतम और चन्दनबाला का नाम आता है। गौतम (इन्द्रभूति गौतम) महावीर के प्रमुख गणधर थे, अर्जुनमाली हिंसा छोड़कर साधु-पथ पर आए, और चन्दनबाला आगे चलकर साध्वी-संघ की प्रमुख बनीं।
महावीर का संदेश
चौथे पद में कहा गया है कि भगवान महावीर ने पापाचार मिटाया, सत्पथ दिखलाया और दयाधर्म का झण्डा जग में लहराया। यह जैन धर्म के मूल सिद्धांत अहिंसा और करुणा का संकेत है।
करुणा और महिमा
अंतिम पद में भगवान महावीर को करुणासागर कहा गया है, और छठे पद में उनके पावन नाम का दिन-रात ध्यान करने से सब कष्ट मिटने का आश्वासन है।
Mahavira
जैन धर्म से और
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