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Embroidered artwork for जैन स्नात्र पूजा विधि एवं स्तोत्र: Embroidered Jain ahimsa palm with a gold wheel, white marble temples and lotuses at dawn

जैन स्नात्र पूजा विधि एवं स्तोत्र

जैन स्नात्र पूजा विधि एवं स्तोत्र

तीर्थंकर प्रतिमा के स्नात्र (अभिषेक) पूजन की विधि और स्तुतियाँ, जो पंडित वीरविजयजी द्वारा रचित मानी जाती हैं।

पूजा विधि एवं नियम

  1. 1तैयारी और शुद्धिकरण

    वेदी और तीर्थंकर प्रतिमा को साफ करें। पूजन सामग्री इकट्ठा करें: जल से भरा एक कलश, दूध, चंदन का पेस्ट, चावल के दाने, फूल, धूप, दीपक और नया वस्त्र। भक्त को स्नान करके शारीरिक और मानसिक शुद्धि के प्रतीक के रूप में स्वच्छ कपड़े पहनने चाहिए।

  2. 2आवाहन और संकल्प

    प्रतिमा के सामने खड़े हों, हाथ जोड़ें, और तीर्थंकर की उपस्थिति के लिए आमंत्रण हेतु पवित्र मंत्र का उच्चारण करें (जैसे 'ओम नमो अरिहंताणं')। फिर स्नात्र पूजा करने का अपना संकल्प घोषित करें, और आध्यात्मिक शुद्धि तथा आशीर्वाद की प्रार्थना करें।

  3. 3शुद्ध जल से अभिषेक

    कलश से शुद्ध जल को धीरे-धीरे प्रतिमा के सिर से पैर तक डालें, मंत्रों का उच्चारण करते हुए। यह कर्मों की विशुद्धि और दिव्य गुणों के जागरण का प्रतीक है। यदि इच्छा हो तो को इस चरण को दूध और जल के मिश्रण से भी दोहराएं।

  4. 4चंदन के पे का लेपन

    प्रतिमा को मुलायम कपड़े से सुखाने के बाद, तीर्थंकर के मस्तक और शरीर पर चंदन (चंदूचा) का लेपन करें। चंदन सदाचार, शांति, और मनके नियंत्रण का प्रतीक है।

  5. 5चावल और फूलों की अर्चना

    प्रतिमा पर अखंड चावल (अक्षत) रखें, फिर गेंदे या मोगरे जैसे ताजे फूल अर्पित करें। चावल समृद्धि और सुख को दर्शाता है, फूल भक्ति और आत्मा के खिलने को प्रदर्शित करते हैं।

  6. 6धूप और दीपक जलाना

    धूपबत्ती (अगरबत्ती) और घी का दीपक जलाएं। प्रतिमा के आगे धूप को घुमाएं ताकि वातावरण शुद्ध हो, फिर दीपक को घड़ी की दिशा में घुमाकर आरती करें, साथ ही भजन या स्त्रोत गाएं।

  7. 7आरती

    भक्ति गीत गाते हुए मूर्ति के समक्ष गोलाकार गति में प्रज्वलित दीपक अर्पित करें, स्नान-अनुष्ठान की समाप्ति को प्रकाश से चिह्नित करते हुए।

  8. 8समापन प्रार्थना और निष्कर्ष

    हाथ जोड़ें, आंखें बंद करें, और भक्तेश्वर स्त्रोत या सरल समर्पण जैसी प्रारंभना पाठ करें। तीर्थंकर से ज्ञान और मोक्ष का आशीर्वाद मांगें। तीन बार प्रणाम करें, फिर प्रसाद को भक्तों में वित करें।

श्लोक

प्राथमिक तैयारी * प्रथम तीन गढके बदले तीन सुंदर पाट रखकर उस पर सिंहासन रखें * नीचे के पाट पर बीच में केसर का स्वस्तिक निकालें और उस पर चावल रखकर श्रीफल रखें * सिंहासन के बीच में केसर का स्वस्तिक निकालें और उस पर रुपये का सिक्का रखकर, तीन नवकार गिनकर उस पर धातु की प्रतिमाजी बिठाएँ * प्रतिमाजी के दाहिनी ओर, प्रतिमाजी की नाक की ऊँचाई तक घी का दीप रखें * बाद में स्नात्र पूजा करने वाले नाडाछडी बाँधकर हाथ में पंचामृत भरा हुआ कलश लेकर तीन नवकार गिन, प्रभुजी और सिद्धचक्रजी को * पक्षाल करें (पंचामृत दूध, दही, शकर, घी और पानी का मिश्रण) * फिर बालाकुंची करके पानी का पक्षाल कर तीन कपड़ों से अंग पोंछकर केसर से पूजा करें * बाद में हाथ धोकर खुद के दाहिने हाथ की हथेली में केसर का स्वस्तिक करें * बाद में स्नात्र करने वाले कुसुमांजलि का थाल लेकर खड़े रहें (कुसुमांजलि- केसर, चावल और पुष्प का मिश्रण)
Praathamik Taiyaari * Pratham teen gadh ke badle teen sundar paat rakhkar us par singhasan rakhein. * Neeche ke paat par beech mein kesar ka swastik nikaalein aur us par chaawal rakhkar shreefal rakhein. * Singhasan ke beech mein kesar ka swastik nikaalein aur us par rupaye ka sikka rakhkar, teen Navkar ginkar us par dhaatu ki pratimaji bithaayein. * Pratimaji ke daahini aur, pratimaji ki naak ki oonchaai tak ghee ka deep rakhein. * Baad mein Snatra pooja karne waale naadachhadi baandhkar haath mein panchaamrit bhara hua kalash lekar teen Navkar gin, Prabhuji aur Siddhachakraji ko pakshaal karein. (Panchaamrit doodh, dahi, shakar, ghee aur paani ka mishran) * Phir baalaakunchi karke paani ka pakshaal kar teen kapdon se ang ponchhkar kesar se pooja karein. * Baad mein haath dhokar khud ke daahine haath ki hatheli mein kesar ka swastik karein. * Baad mein Snatra karne waale kusumaanjali ka thaal lekar khade rahein. (Kusumaanjali - kesar, chaawal aur pushpa ka mishran)

श्लोक 1

( पंडित श्री वीरविजयजी कृत) ( पहले कलश लेकर खड़े रहना) काव्य (द्रुतविलंबित वृत्तम्‌) सरस-शांति-सुधारस सागरं, शुचितरं गुणरत्नमहागरं भविक-पंकज-बोध-दिवाकरं, प्रतिदिनं प्रणमामि जिनेश्वरं
(Pandit Shree Veer Vijayji Krit) (Pehle kalash lekar khade rehna) Kaavya (Drutavilambit Vrittam) Saras-shaanti-sudhaarasa saagaram, shuchitaram gunaratnamahaagaram. Bhavika-pankaja-bodha-divaakaram, pratidinam pranamaami jineshvaram. ॥1॥

श्लोक 2

( यहाँ प्रक्षाल करना) दोहा कुसुमाभरण उतारीने, पडिमा धरिये विवेक मज्जन पीठे स्थापीने, करिये जल अभिषेक 2
(Yahaan prakshaal karna) ॥ Doha ॥ Kusumaabharan utaareene, padima dhariye vivek. Majjan peethe sthaapeene, kariye jal abhishek. ॥2॥

श्लोक 3

( कुसुमांजलि की थाली लेकर खड़े रहना) गाथा-आर्या गीति जिण जम्मसमये, मेरु सिहरे रयणकणयकलसेहिं देवासुरेहिं न्हाविउं, ते धन्ना जेहिं दिठ्ठोसि
(Kusumaanjali ki thaali lekar khade rehna) ॥ Gaatha-Aarya Geeti ॥ Jin jamma samaye, Meru sihare rayana kanaya kalasehin. Devasurehin nhaavium, te dhanna jehin ditthosi. ॥3॥

श्लोक 4

( प्रभुजी के दाहिने अँगूठे पर कुसुमांजलि रखना) ( नमोऽर्हत्‌ सिद्धाचार्य बोलना) कुसुमांजलि ढाल निर्मल जलकलशे न्हवरावे, वस्त्र अमूलक अंग धरावे कुसुमांजलि मेलो आदिजिणंदा, सिद्धस्वरूपी अंग पखाली
(Prabhuji ke daahine angoothe par kusumaanjali rakhna) (Namo Arhat Siddhaachaarya bolna) ॥ Kusumaanjali Dhaal ॥ Nirmal jal kalashe nhavaraave, vastra amoolak ang dharaave. Kusumaanjali melo Aadi Jinanda, siddhasvaroopi ang pakhaali. ॥4॥

श्लोक 5

आतम निर्र्मल हुई सुकुमालि, कुसुमांजलि मेलो आदि जिणंदा
Aatam nirmal hui sukumaali, kusumaanjali melo Aadi Jinanda.

श्लोक 6

( दाहिने अँगूठे पर कुसुमांजलि रखना)
(Daahine angoothe par kusumaanjali rakhna)

श्लोक 7

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

शुभ दिन व तिथि

नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर

उत्तम मुहूर्त / समय

ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल

पूजन सामग्री व अर्पण

शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ
  • मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार

पृष्ठभूमि

यह पाठ जैन श्वेतांबर परंपरा से जुड़ा है और पंडित वीरविजयजी की रचना माना जाता है, जिनकी स्नात्र पूजा परंपरा से विक्रम संवत 1885 (19वीं शताब्दी का आरंभ) के आसपास की मानी जाती है। इसमें प्रतिदिन या विशेष अवसरों पर तीर्थंकर की प्रतिमा का जल, पंचामृत आदि से अभिषेक किया जाता है। इसमें एक संस्कृत श्लोक और अन्य प्राकृत व हिंदी-गुजराती मिश्रित पद्य शामिल हैं। यह पूजा आत्मशुद्धि और भक्ति के लिए की जाती है।

कथा और महिमा

स्नात्र पूजा मेरु पर्वत पर इंद्र द्वारा तीर्थंकर के जन्म-स्नान का पुनःअभिनय करती है, जैन पर्वों तथा शुभ दिनों पर की जाने वाली मूर्ति का औपचारिक स्नान।

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इस पाठ के विषय में

रचयिता: Pandit Veervijayji

क्या आप जानते हैं?

रचना

यह स्नात्र-पूजा (प्रतिमा को जल से स्नान कराने की विधि) पंडित श्री वीरविजयजी द्वारा रचित है, जो जैन परंपरा के प्रसिद्ध विद्वान थे। पहला श्लोक 'द्रुतविलंबित' नामक संस्कृत छंद में है, जो अपनी लय और माधुर्य के लिए जाना जाता है।

विधि का क्रम

यह पाठ केवल स्तुति नहीं, बल्कि पूजा का चरण-दर-चरण निर्देश है — सिंहासन की तैयारी, केसर से स्वस्तिक बनाना, पंचामृत (दूध, दही, घी, शकर, पानी) से स्नान, और अंत में कुसुमांजलि (केसर, चावल और फूलों का मिश्रण) अर्पित करना।

पौराणिक संदर्भ

गाथा में कहा गया है कि जब तीर्थंकर (जिन) का जन्म हुआ, तब देवों और असुरों ने मेरु पर्वत पर स्वर्ण कलशों से उनका अभिषेक किया था। यह श्लोक उसी दिव्य घटना को स्मरण करता है और भक्त उसी भावना से प्रतिमा का स्नान करता है।

प्रतीकात्मक अर्थ

'कुसुमांजलि' केवल फूल-चावल नहीं है — यह भक्त के हृदय की पवित्रता और समर्पण का प्रतीक है। 'आतम निर्मल हुई सुकुमालि' पंक्ति में कहा गया है कि जैसे प्रतिमा जल से निर्मल होती है, वैसे ही भक्त का आत्मा भी शुद्ध हो जाता है।

भाषा-शैली

यह रचना संस्कृत, प्राकृत (गाथा) और राजस्थानी-हिन्दी मिश्रित भाषा में है, जो जैन साहित्य की विशेषता है। 'दोहा' और 'ढाल' जैसे छंद इसे गायन-सुलभ बनाते हैं, जिससे पूजा के दौरान भक्त इसे सस्वर पाठ कर सकें।

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Mahavira

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