कल्याणमन्दिर स्तोत्र
44 श्लोकों का कल्याणमन्दिर स्तोत्र भगवान पार्श्वनाथ की स्तुति है; परम्परा इसे आचार्य कुमुदचन्द्र (सिद्धसेन दिवाकर) की रचना मानती है।
श्लोक
हे जिनेश्वर! आप कल्याण के मंदिर हैं, उदार हैं, पापों का भेदन करने वाले हैं, भयभीतों को अभय प्रदान करने वाले हैं, आपके चरणकमल निंदित नहीं हैं, और संसार-सागर में डूबते हुए सभी प्राणियों के लिए नौका के समान हैं। मैं आपको प्रणाम करता हूँ।
श्लोक 1
जिसकी महिमा के सागर के सामने स्वयं देवगुरु भी विस्तृत बुद्धि होते हुए भी स्तोत्र रचने में समर्थ नहीं हैं, उस तीर्थेश्वर की, जो कमठ के अभिमान के लिए धूमकेतु के समान हैं, मैं यह स्तवन करने का प्रयास कर रहा हूँ।
श्लोक 2
हे अधीश! सामान्य रूप से भी आपके स्वरूप का वर्णन करने में मेरे जैसे अधीश कैसे समर्थ हो सकते हैं? यदि कोई धृष्ट बालक या दिवान्ध व्यक्ति सूर्य के रूप का वर्णन करना चाहे तो वह क्या कर सकता है?
श्लोक 3
हे नाथ! मोह के क्षय होने पर भी कोई मर्त्य आपके गुणों को गिनने में समर्थ नहीं होता। जैसे कल्पान्त में उगले गए जल के प्रकट होने पर भी समुद्र के रत्नराशि का किसी द्वारा माप नहीं किया जा सकता।
श्लोक 4
हे नाथ! मैं जड़बुद्धि होते हुए भी आपका स्तवन करने के लिए उद्यत हूँ, जो असंख्य गुणों के भंडार हैं। क्या बालक अपनी दोनों भुजाओं को फैलाकर अपनी बुद्धि के समुद्र की विस्तीर्णता का वर्णन नहीं करता?
श्लोक 5
हे ईश! आपके जो गुण योगियों के द्वारा भी कहे नहीं जा सकते, उनमें मेरा अवकाश कैसे हो सकता है? अतः यह असमीक्षित कार्य ही हुआ, क्योंकि पक्षी भी अपनी वाणी से अपनी सामर्थ्य के अनुसार ही बोलते हैं।
श्लोक 6
हे जिन! आपके स्तवन की तो बात ही क्या, आपका नाम भी संसारों की रक्षा करता है। ग्रीष्म ऋतु में तीव्र धूप से पीड़ित पथिकों को पद्म-सरोवर की वायु भी प्रीति प्रदान करती है।
श्लोक 7
हे विभो! जब आप समीप होते हैं, तो प्राणी के घने कर्म-बन्ध भी क्षण भर में शिथिल हो जाते हैं। जैसे वन में चन्दन के वृक्ष के मध्य भाग में आए हुए साँप मयूर के आने पर तुरन्त शान्त हो जाते हैं।
श्लोक 8
हे जिनेन्द्र! आपके दर्शन मात्र से मनुष्य रुद्रों के सैकड़ों उपद्रवों से सहसा मुक्त हो जाते हैं। जैसे स्फुरित तेजस्वी गो-स्वामी के दृष्ट मात्र ही चोर शीघ्र भाग जाते हैं और पशु सुरक्षित हो जाते हैं।
श्लोक 9
हे जिन! आप भव्य प्राणियों के तारक हैं। वे ही प्राणी आपको हृदय में धारण करके कैसे तरते हैं? या, मशक इसलिए तैरता है क्योंकि उसके अंदर जल है; वास्तव में वह अन्तर्गत वायु का प्रभाव है।
श्लोक 10
जिसके सामने हर आदि भी प्रभावहीन हो गए थे, उस रति-पति को आपने क्षण में क्षपित कर दिया। जिस अग्नि को जल से शान्त किया गया, क्या वह जल दुर्धर बड़वानल द्वारा पीया नहीं गया?
श्लोक 11
हे स्वामिन्! आपको प्रपन्न होकर हृदय में धारण करने वाले प्राणी अल्प गरिमा वाले होते हुए भी जन्मोदधि को अतिलाघव से कैसे तर जाते हैं? महात्माओं का प्रभाव तो अचिन्त्य ही है।
श्लोक 12
हे विभो! यदि आपने पहले क्रोध को निरस्त कर दिया, तो बताइए, कर्म-चोर कैसे नष्ट हुए? यदि शिशिर हिम भी नीले वृक्षों को जला सकता है, तो क्या नहीं हो सकता?
श्लोक 13
हे जिन! योगीजन सदा आपको परमात्मरूप में हृदय-कमल के कोष-देश में अन्वेषण करते हैं। पूत और निर्मल रुचि वाले कमल का जन्म-स्थान कर्णिका के अतिरिक्त और क्या हो सकता है?
श्लोक 14
हे जिनेश! आपके ध्यान से भव्य प्राणी क्षण भर में देह छोड़कर परमात्म-दशा को प्राप्त हो जाते हैं। जैसे लोहे में तीव्र अग्नि के संयोग से पत्थरपन दूर होकर वह सोना बन जाता है।
श्लोक 15
हे जिन! जिसके द्वारा आप सदा अन्तःकरण में ध्यान किए जाते हैं, उन भव्यों का शरीर कैसे नष्ट होता है? यह तो मध्य-विवर्ती महानुभावों का स्वरूप है कि वे शरीर को शान्त करते हैं।
श्लोक 16
हे जिनेन्द्र! मनीषीजन इस आत्मा को आपसे अभेद बुद्धि से ध्यान करते हैं, यही आपका प्रभाव है। पानी को भी यदि अमृत मानकर चिन्तन किया जाए, तो क्या वह विष-विकार को दूर नहीं करता?
श्लोक 17
हे विभो! परवादी भी आपको, जो तमस से रहित हैं, हरि-हर आदि की बुद्धि से प्राप्त करते हैं। क्या पीलिया से ग्रस्त लोग शंख को सफेद होते हुए भी विविध वर्णों से युक्त नहीं देखते?
श्लोक 18
धर्मोपदेश के समय आपके सान्निध्य के प्रभाव से तो यह जन तो क्या, वृक्ष भी अशोक हो जाता है। जब सूर्य उदय होता है, तो क्या समस्त जीव-लोक जागृत नहीं होता?
श्लोक 19
हे विभो! यह आश्चर्य है कि नीचे की ओर मुख वाले डंठल पर ही सुर-पुष्पों की वृष्टि होती है? हे मुनीश! देवताओं के बन्धन ही नीचे की ओर जाते हैं।
श्लोक 20
उचित ही है कि आपकी वाणी को अमृत कहा जाता है, जो गभीर हृदय-समुद्र से उत्पन्न हुई है। इसे पीकर भव्य प्राणी परम आनन्द के भागी होते हैं और तुरंत अजरामरत्व प्राप्त करते हैं।
श्लोक 21
हे स्वामिन्! दूर तक झुककर उठने वाले पवित्र सुर-चामर समूह, मैं समझता हूँ, कह रहे हैं कि जो इस मुनि-पुङ्गव को नति करते हैं, वे निश्चय ही ऊर्ध्वगति वाले और शुद्धभाव वाले होते हैं।
श्लोक 22
हे भव्य-शिखण्डिन्! वे आपको देखते हैं, जो श्याम वर्ण, गम्भीर वाणी वाले, उज्ज्वल स्वर्ण-रत्न-सिंहासन पर विराजमान हैं, और उच्च स्वर में गरजते हुए, मानो स्वर्ण पर्वत के शिखर पर नवीन बादल हों।
श्लोक 23
आपके श्याम-द्युति मण्डल के उदय से अशोक-वृक्ष की छवि लुप्त हो गई। हे वीतराग! आपके सान्निध्य मात्र से कौन सचेतन भी रागरहित नहीं हो जाता?
श्लोक 24
हे लोगो! प्रमाद को त्यागकर इस निर्वृति-पुरी के नायक की भजना करो। हे देव! आपका सुरदुन्दुभि आकाश में गरजते हुए तीनों लोकों को यह निवेदन कर रहा है, ऐसा मैं मानता हूँ।
श्लोक 25
हे नाथ! आपके द्वारा लोकों के उद्योतित होने पर तारासहित चन्द्रमा का अधिकार हट गया। मोतियों की माला और श्वेत छत्र के व्याज से तीन रूप धारण करके वह निश्चय ही शरण में आया है।
श्लोक 26
हे भगवन्! आप माणिक्य, स्वर्ण और रजत से निर्मित तीन मण्डपों से चारों ओर विभासित होते हैं, मानो आपकी कान्ति, प्रताप और यश के संचय से तीनों लोक परिपूर्ण हो गए हों।
श्लोक 27
हे जिन! त्रिदशाधिपतियों की दिव्य मालाएँ रत्न-रचित मौलि-बन्धों को छोड़कर आपके चरणों का आश्रय लेती हैं। या, आपके सङ्गम में देवता अन्यत्र रमण नहीं करते।
श्लोक 28
हे नाथ! आप जन्म-समुद्र से विमुख होते हुए भी अपनी पीठ से लगे हुए सद्बुद्धि प्राणियों को तारते हैं। यह आपके लिए उचित है, क्योंकि आप पृथ्वी के स्वामी हैं; पर यह आश्चर्य है कि आप कर्म-विपाक से शून्य हैं।
श्लोक 29
हे जन-पालक! आप विश्वेश्वर होते हुए भी निर्धन हैं। हे ईश! आप वर्णों के स्वरूप होते हुए भी लिपि से रहित हैं। अज्ञान में भी सदैव किसी न किसी प्रकार आपमें ज्ञान स्फुरित होता है, जो विश्व के विकास का हेतु है।
श्लोक 30
शठ कमठ ने क्रोध से जो धूल उठाई, जो आकाश को भरने वाली थी, उसने आपकी छाया को भी नहीं हरा पाई। हे नाथ! वह हताश दुरात्मा स्वयं ही उस धूल से ग्रस्त हो गया।
श्लोक 31
जो दैत्य द्वारा मुक्त दुस्तर जल, गर्जनशील घनौघ, भीम तड़ित और मांसल धारा से युक्त था, उसे आपने धारण किया, हे जिन! और वही जल उसके लिए दुःसह कृत्य बन गया।
श्लोक 32
जो प्रेत-समूह, उर्ध्व केश, विकृत आकृति, मर्त्य-मुण्डों के लम्बे लटकनों से युक्त, भयद वक्त्र से अग्नि निकालता हुआ, आपके विरुद्ध भेजा गया था, वह उस दैत्य के लिए प्रत्येक जन्म में भव-दुःख का हेतु बन गया।
श्लोक 33
हे भुवनाधिप! धन्य हैं वे भूमि पर जन्म लेने वाले, जो तीनों संध्याओं में विधिपूर्वक अन्य कृत्यों को छोड़कर, भक्ति से उल्लसित पुलकित देह वाले होकर आपके दोनों चरणों की आराधना करते हैं।
श्लोक 34
हे मुनीश! इस अपार भव-जलधि में, मैं मानता हूँ, आप मेरे श्रवण-गोचर नहीं हुए हैं। किन्तु जब आपके पवित्र गोत्र-मन्त्र का श्रवण होता है, तो विपत्तियों की सर्पिणी कैसे समीप आ सकती है?
श्लोक 35
हे देव! मैं मानता हूँ कि पिछले जन्म में भी मैंने आपके चरण-युगल की पूजा नहीं की, जो अभीष्ट दान में दक्ष हैं। इसी कारण इस जन्म में, हे मुनीश! मैं पराभवों का निकेतन और क्षुब्ध मन वाला हूँ।
श्लोक 36
निश्चय ही मोह-तिमिर से आवृत नेत्रों द्वारा मैंने पहले कभी आपको नहीं देखा। ये हृदय को बेधने वाले अनर्थ मुझे व्याकुल कर रहे हैं—अन्यथा ये प्रबल दुःख कैसे उत्पन्न होते?
श्लोक 37
सुना, पूजित और देखा जाने पर भी निश्चय ही मैंने आपको भक्तिपूर्वक चेतसि धारण नहीं किया। हे जन-बान्धव! इसी कारण मैं दुःखपात्र बन गया हूँ, क्योंकि भाव-शून्य क्रियाएँ फल नहीं देतीं।
श्लोक 38
हे नाथ! हे दुःखीजनों पर वत्सल! हे शरण्य! हे करुणा और पुण्य के निवास! हे वशियों में वरेण्य! हे महेश! भक्तिपूर्वक नत हुए मुझ पर दया करके दुःखों के नाश में तत्परता प्रदान करें।
श्लोक 39
हे शरण्य! आप मित्रता के सार हैं, शरण हैं, शरण्य हैं, शत्रुओं को नष्ट करने वाले और प्रसिद्ध हैं। आपके चरण-कमल का आश्रय पाकर भी मैं ध्यान से रहित हूँ। हे भवन-पावन! हा! मैं हत हूँ।
श्लोक 40
हे देवेन्द्र-वन्द्य! हे विदिताखिल-वस्तुसार! हे संसार-तारक! हे विभो! हे भुवनाधिनाथ! हे करुणा-ह्रद! मुझे त्राण दें, मुझे पवित्र करें, जो इस समय भयद व्यसनों के समुद्र से सीद रहा हूँ।
श्लोक 41
हे नाथ! यदि आपके चरण-कमलों की सन्तत सञ्चित भक्ति का कोई फल है, तो हे शरण्य! आप ही मेरे एकमात्र शरण हों—इस लोक में और परलोक में भी। आप ही मेरे स्वामी हैं।
श्लोक 42
हे जिनेन्द्र! इस प्रकार समाहित बुद्धि वाले, विधिपूर्वक, सान्द्र उल्लसित पुलक से आच्छादित अंगों वाले, आपके निर्मल मुख-कमल पर लक्ष्य बाँधकर, भव्य प्राणी आपका यह स्तवन रचते हैं।
श्लोक 43
वे जन-नयन-कुमुद के चन्द्र के समान प्रकाशमान स्वर्ग-सम्पदाओं को भोगकर, समस्त मलों से रहित होकर, शीघ्र ही मोक्ष को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 44
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
यह स्तोत्र जैन भक्ति-परम्परा का है और 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ को समर्पित है; श्लोक 2 में उन्हें कमठ दैत्य के अहंकार को भस्म करने वाला कहा गया है। परम्परा इसे आचार्य कुमुदचन्द्र की रचना मानती है, जिन्हें सिद्धसेन दिवाकर से अभिन्न माना जाता है; यह नाम श्वेताम्बर और दिगम्बर दोनों परम्पराओं में आदरणीय है। उनके काल पर विद्वानों में मतभेद है, और अन्तिम श्लोक (44) में उनका नाम 'कुमुदचन्द्र' आता है। स्तोत्र में 44 श्लोक हैं, जो अन्तिम (आर्या छन्द) को छोड़कर सब वसन्ततिलका छन्द में हैं। जैन श्रद्धालु पूजा और ध्यान में इसका पाठ करते हैं।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Acharya Kumudachandra
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रचयिता और परिचय
'कल्याणमन्दिर स्तोत्र' 44 श्लोकों का संस्कृत स्तोत्र है, जो 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ की स्तुति में रचा गया है। परम्परा इसे आचार्य कुमुदचन्द्र की रचना मानती है, जिन्हें सिद्धसेन दिवाकर से अभिन्न माना जाता है; श्लोक 44 में 'कुमुदचन्द्र' शब्द आता है। उनके काल पर विद्वानों में मतभेद है.
कमठ दैत्य की कथा
श्लोक 2 में पार्श्वनाथ को कमठ के अहंकार को भस्म करने वाला कहा गया है, और श्लोक 31-33 में इस पुराने शत्रु के आक्रमणों का वर्णन है: धूल के बादल जो जिनेन्द्र की छाया तक को छू न सके, भयंकर जलप्रलय जिसे उन्होंने सहा, और प्रेतों का समूह। स्तोत्र के अनुसार यह सब अन्ततः आक्रमणकारी के ही दुःख का कारण बना.
कामदेव पर विजय
श्लोक 11 में कहा गया है कि जिस कामदेव ने शिव आदि को भी निस्तेज कर दिया, उसे जिनेन्द्र ने क्षण भर में नष्ट कर दिया। यह संकेत करता है कि जिन वीतराग हैं और मोह पर उनकी विजय पूर्ण है.
स्तोत्र का मुख्य उद्देश्य
यह स्तोत्र भव्य जीवों (जो मोक्ष के अधिकारी हैं) को संसार-सागर से पार कराने के लिए भगवान की स्तुति करता है। हर श्लोक में भगवान के गुणों – करुणा, शरण्यता, कर्म-बन्धनों को तोड़ने की क्षमता – का वर्णन है।
भक्त का समर्पण
अंतिम श्लोकों (34-44) में भक्त विनम्रतापूर्वक अपनी अयोग्यता स्वीकार करते हुए भगवान के चरणों में शरण माँगता है। वह कहता है कि केवल भगवान की भक्ति ही दुखों से मुक्ति दिला सकती है – यह स्तोत्र के भाव-पक्ष का सार है।
Parshvanatha
जैन धर्म से और
सभी देखेंसंबंधित शिक्षाएं
एक ही शिक्षा, विभिन्न परंपराओं में प्रतिध्वनित
