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Embroidered artwork for जय नेमिनाथ स्वामी भजन: Embroidered Jain ahimsa palm with a gold wheel, white marble temples and lotuses at dawn

जय नेमिनाथ स्वामी भजन

जय नेमिनाथ स्वामी भजन

जैन परंपरा के 22वें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ की आरती, जो उन्हें संसार-सागर से तारने वाला और समवशरण में विराजमान बताती है।

श्लोक

जय नेमिनाथ स्वामी, प्रभु जय नेमिनाथ स्वामी जय नेमिनाथ स्वामी, प्रभु जय नेमिनाथ स्वामी
Jai Neminath Swami, Prabhu Jai Neminath Swami Jai Neminath Swami, Prabhu Jai Neminath Swami

श्लोक 1

तुम हो भव दधि तारक प्रभु जी, तुम हो भव दधि तारक प्रभु जी अन्तर के यामि स्वामी, जय नेमिनाथ स्वामी ०
Tum Ho Bhav Dadhi Taarak Prabhu Ji, Tum Ho Bhav Dadhi Taarak Prabhu Ji. Antar Ke Yami Swami, Jai Neminath Swami.

श्लोक 2

समवशरण में आप विराजे, समवशरण में आप विराजे खिरे मधुर वाणी स्वामी, जय नेमिनाथ स्वामी ०
Samavasharan Mein Aap Viraje, Samavasharan Mein Aap Viraje. Khire Madhur Vaani Swami, Jai Neminath Swami.

श्लोक 3

सुन भवि परम तत्व को पावत, सुन भवि परम तत्व को पावत सुख सम्यक ज्ञानी स्वामी, जय नेमिनाथ स्वामी ०
Sun Bhavi Param Tattva Ko Paawat, Sun Bhavi Param Tattva Ko Paawat. Sukh Samyak Gyani Swami, Jai Neminath Swami.

श्लोक 4

यक्ष यक्षिणी चंवर ढोरते, यक्ष यक्षिणी चंवर ढोरते महिमा अब जानी स्वामी, जय नेमिनाथ स्वामी ०
Yaksh Yakshini Chanwar Dhorte, Yaksh Yakshini Chanwar Dhorte. Mahima Ab Jaani Swami, Jai Neminath Swami.

श्लोक 5

तीन छत्र सिर पर तुम सोहे, तीन छत्र सिर पर तुम सोहे ध्यावत मुनि ध्यानी स्वामी, जय नेमिनाथ स्वामी ०
Teen Chhatra Sir Par Tum Sohe, Teen Chhatra Sir Par Tum Sohe. Dhyaawat Muni Dhyaani Swami, Jai Neminath Swami.

श्लोक 6

जय नेमिनाथ स्वामी, प्रभु जय नेमिनाथ स्वामी
Jai Neminath Swami, Prabhu Jai Neminath Swami

श्लोक 7

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

शुभ दिन व तिथि

नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर

उत्तम मुहूर्त / समय

ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल

पूजन सामग्री व अर्पण

शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ
  • मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पाठ विधि सुझाव:संध्याकालीन पूजा के अंत में सपरिवार मिलकर दीपक घुमाते हुए आरती गाएं।

पृष्ठभूमि

यह आरती जैन परंपरा की है और 22वें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ (अरिष्टनेमि) की स्तुति करती है। उनका जीवन-वृत्त उत्तराध्ययन सूत्र (अध्ययन 22), कल्पसूत्र और हेमचन्द्र के त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित में मिलता है। इसे जैन मंदिरों और घरों में पूजा-सभाओं तथा तीर्थंकरों से जुड़े पर्वों पर गाया जाता है। आरती में उनके समवशरण में विराजमान होने, मधुर दिव्य वाणी खिरने और भक्तों को परम तत्त्व का ज्ञान मिलने का वर्णन है, और इसकी सरल टेक सामूहिक गायन के लिए सुगम है।

क्या आप जानते हैं?

कौन थे नेमिनाथ?

नेमिनाथ (अरिष्टनेमि) जैन धर्म के 22वें तीर्थंकर हैं। परंपरा के अनुसार उनका जन्म शौरीपुर में राजा समुद्रविजय के पुत्र के रूप में हुआ और वे श्रीकृष्ण के चचेरे भाई थे, क्योंकि समुद्रविजय वसुदेव के भाई थे। उत्तराध्ययन सूत्र (अध्ययन 22) के अनुसार राजीमती से विवाह की पूर्व-संध्या पर बाड़े में बंद पशुओं की पुकार सुनकर उन्होंने संसार त्याग दिया और गिरनार पर्वत से मोक्ष प्राप्त किया।

समवशरण का चित्रण

पद 3 में प्रभु समवशरण में विराजमान हैं, जहाँ तीर्थंकर धर्मोपदेश देते हैं। इसे प्रायः ऊँची-ऊँची श्रेणियों वाला विशाल सभागार बताया जाता है, जहाँ मनुष्य, पशु और देव सभी एक साथ बैठकर एक ही वाणी सुनते हैं।

यक्ष-यक्षिणी

पद 5 में यक्ष-यक्षिणी प्रभु पर चँवर ढोरते हैं। हर तीर्थंकर के एक यक्ष-यक्षिणी युगल रक्षक होते हैं; नेमिनाथ के लिए श्वेतांबर सूचियों में गोमेध और अंबिका तथा दिगंबर सूचियों में सर्वाह्न और कूष्मांडिनी के नाम आते हैं।

तीन छत्र

पद 6 में प्रभु के सिर पर तीन छत्र शोभित हैं। ये तीर्थंकर के अष्ट प्रातिहार्यों में से एक छत्रत्रय हैं और स्वर्ग, पृथ्वी तथा पाताल, तीनों लोकों पर उनकी प्रभुता के प्रतीक माने जाते हैं।

भवदधि तारक

पद 2 में उन्हें 'भव दधि तारक' कहा गया है, यानी जन्म-मरण के सागर से पार उतारने वाला। यह तीर्थंकर को मोक्ष का मार्ग दिखाने वाले पथप्रदर्शक के रूप में देखने की प्रचलित भक्ति-उपमा है।

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